ब्रायोफाइटा ( Bryophyta ) : ब्रायोफाइटा भ्रूण ( Embryo ) बनाने वाले पौधों का सबसे साधारण व आध ( Primitive ) समूह है । इनमें संवहन ऊतक ( Vascular tissue ) नहीं होता है । ये पौधे स्थलीय ( Terrestrial ) होने के साथ छायादार एवं नम ( Moist ) स्थानों पर उगते हैं । इन्हें अपने जीवन
काल में पर्याप्त आर्द्रता की आवश्यकता
बायोफाइटा का आर्थिक महत्व
1. द्रायोफाइटा वर्ग के पौधे मृदा अपरदन ( Soil erosion ) को रोकने में सहायता प्रदान करते हैं ।
2. ब्रायोफाइटा वर्ग के पौधों में जल अवशोषण की पर्याप्त समता होती है । अतः ये बाढ़ ( Flood ) रोकने में सहायता करती हैं ।
3. स्फेगनम ( Sphagnum ) जैसे ब्रायोफाइट्स का प्रयोग ईंधन के रूप में किया जाता है ।
4. एस्किमो जनजाति समुदाय स्फेगनम का प्रयोग चिराग में बत्ती की जगह करते हैं ।
5. मॉस ( Moss ) का प्रयोग एन्टिसेप्टिक ( Antiseptic ) के रूप में किया जाता है ।
6. शाकाहारी स्तनधारी कुछ प्रायोफाइट्स पौधे का प्रयोग भोज्य पदार्य के रूप में करते हैं ।
ब्रायोफाइटा का वर्गीकरण ( Classification of Dryophyta ) ; ब्राचोफाइटा को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है
1. हिपेटोकोप्सिडा ( Hepatocopsida ) या लिवरवर्ट ( Liver Twrort ) : इसके अन्तर्गत रिक्सिया ( Riccia ) , मार्केन्सिया ( Marchential , पोरेला ( Porella ) आदि आते हैं ।
2 एन्योसिरोटोप्सिडा ( Anthocerotopsida ) या हार्नवर्ट ( Horm merort ) : इसके अन्तर्गत एन्थोसिरोस ( Anthoceros ) आता है ।
3. ब्रायोसिडा ( Bryopsida ) या मॉस ( Mass ) : इसके अन्तर्गत स्फेगनम ( Sphagnum ) , फ्यूनेरिया ( Funaria ) आदि जैसे प्रायोफाइट्स आते हैं ।
नोट : 1 प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान स्फेगनम का प्रयोग सई की जगह घाव को भरने के लिए किया गया था ।
2. डाउसोनिया सबसे बड़ा प्रायोफाइटा तथा जूओप्सिस ( Zoopsis ) सबस छोटा ब्रायोफाइटा है ।
3. संवहन तंत्र का न होना बायोफाइटा का विशिष्ट लक्षण है ।
ट्रैकियोफाइटा ( Tracheophyta ) : ट्रैकियोफाइटा प्रभाग में उन पादपों को सम्मिलित किया गया है जिनमें संवहनी ऊतक ( Vascular tissue ) पाये जाते हैं । इस प्रभाग में अब तक 2.75 लाख जातियों की खोज की जा चुकी है । इस प्रभाग को पुनः तीन उप - प्रभाग में विभाजित किया गया है
1. टेरिडोफाइटा ( Preridophyta )
2. अनावृत्तबीजी ( Gymnosperm ) तथा
3. आवृत्तबीजी ( Angiosperm )
टेरिडोफाइटा ( Pteridophyta ) : इस उप - प्रभाग में अपुष्पोभिद् ( Cryptogamous ) पादपों को रखा गया है । इस उप - प्रभाग के सदस्यों में जल एवं खनिज लवण के संवहन हेतु संवहन ऊतक ( Vascular tissue ) पाये जाते हैं । इस उप - प्रभाग के पादपों में पाये जाने वाले प्रमुख लक्षण निम्नलिखित है
1. इनका शरीर जड , तना एवं पत्ती में विभाजित रहता है ।
2. इनमें संवहन ऊतक जाइलम ( Xplem ) एवं फलोएम ( Phloem ) में बँटा रहता है ।
3. इनमें पुष्प और बीज का निर्माण नहीं होता है ।
4. इनमें मुख्य पौधा बीजाणुभिद् ( Sporophyte ) होता है जिसमें प्रायः जड़ , तना ( स्तम्भ ) तथा पत्ते होते हैं ।
5. इनमें बीजाणु ( Spores ) बीजाणुधानियों ( Sporangia ) में उत्पन्न होते हैं ।
6. बीजाणुधानियाँ ( Spporangia ) जिस पत्ती पर उत्पन्न होती हैं . उस पत्ती को बीजाणुपर्ण ( Sporophy ) कहते हैं । 7. युग्मोभिद् ( Gametophyte ) पौधे पर नर जननांग पुंधानी ( Antheridium तथामादाजननांग स्त्रीधानी ( Archegorium ) उत्पन्न होते हैं ।
8. इन पौधों में एक निश्चित पीढ़ी एकान्तरण ( Altration of generation ) होता है ।
9. जाइगोट ( Zygote ) में जाइगोस्पोर ( Zygospore ) का निर्माण होता है । टेरिडोफाइटा को चार उपफाइलम में विभाजित किया गया है
1. साइलोप्सिडा ( Psilopsida ) : जैसे — साइलोटम
2. लाइकोप्सिता ( Lycopsida ) : जैसे - लाइकोपोडियम
3. स्फिनोसिडा ( Sphenopsida ) : जैसे -- इक्वीसेंटम
4.टेरोप्सिडा ( Pteropsida ) : जैसे - ड्रायोप्टेसिस या फर्न
टेरिडोफाइटा का आर्थिक महत्व
1. लाइकोपोडियम के बीजाणु दवाई के रूप में प्रयोग किये जाते हैं ।
2 मासिलिया ( Marsilea ) तथा सिरेटोप्टेरिस ( Ceratopteris ) जैसे टेरिडोफाइट्स का उपयोग सब्जी के रूप में होता है ।
3. टेरिडियम का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में होता है ।
4. सिलेजिनेला ( Selaginella ) में पुनर्जीवन का गुण पाया जाता है । इस कारण इसका उपयोग मेजों पर सजावट हेतु किया जाता है । 5. इक्विसेटम ( Equisetum ) नामक टेरिडोफाइट्स से सोना प्राप्त किया जाता है ।
नोट :
1. फर्न टेरिडोफाइटा वर्ग का सबसे विख्यात पौधा है ।
2. टेरिडोफाइटा का सबसे पहला जीवाश्म Late Paleozoic काल के सिलुरियन अवधि ( Silurian perior ) में देखा गया था । इस कारण Late paleoroic को Age of Pteridophytes कहा जाता है ।
3. भारतीय टेरिडोफाइट जीवाश्मों का विस्तृत अध्ययन सुरंज ( Surange ) नामक वनस्पतिशास्त्री द्वारा किया गया है । 4. टेरिडोफाइटा को विकसित वीजरहित पौधा कहा जाता है ।
अनावृत्तबीजी ( Gymnosperms ) : अनावृत्तबीजी ( Cymme sperms ) बीजीय पौधों ( Spermatophytes ) का यह सब - फाइलम है , जिसके अन्तर्गत वे पौधे आते हैं , जिनमें नग्न बीज आते हैं , अर्थात् बीजाण्ड ( Ovules ) तथा उनसे विकसित बीज किसी खोल या फल में बन्द नहीं होते हैं । इनमें अंडाशय ( Ovary ) का पूर्ण अभाव होता है । यह पुराने पौधों का वर्ग है । इस उप - प्रभाग में लगभग 900 जातियों को रखा गया है । इसके प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं 1. इस उप प्रभाग के पौधे बहुवर्षीय ( Pereranial ) होते हैं ।
2. वे मरुभिद् ( Xerophytic ) स्वभाव के होते हैं ।
3. इनमें स्पष्ट वार्षिक बल ( Annual rings ) बनते हैं ।
4. इनके बीजों में वीजावरण नहीं पाया जाता है ।
5. इनमें संवहन ऊतक ( Vascular tissue ) पाये जाते हैं ।
6 ये नग्नबीजी तथा आशाखित होते हैं ।
7. इनमें वायु परागण ( Anemophilly होता है ।
8. इनमें साधारण तथा बहुभ्रूणता ( Polyembryony ) पायी जाती है ।
9. भ्रूण ( Embryo ) से मूलांकुर ( Radicle ) तथा प्राकुर ( Plumule ) के साथ ही एक या एक से अधिक बीजपत्र बनते हैं ।
10. साइकस ( Cycas ) में काष्ठ ( Wood ) मेनोजाइलिक ( Manoxylic ) तथा पाइनस ( Pinus ) में पिक्नोजाइलिक ( Pycmoxylic ) होती है ।
11. साइकब की कोरेलॉयड ( Coralloid ) जड़ों से नील हरित शैवाल एनाबीना ( Anabena ) तथा नॉस्टोक ( Nastoc ) पाये जाते हैं , जो सहजीवी ( Symbiotic ) सम्बन्ध प्रदर्शित करते हैं ।
12 सबसे बड़ा अण्डाणु तथा शुक्राणु साइकस का होता है , जो कि एक जिम्नोस्पर्म है ।
13. इनमें जननांग , कोन्स ( Cones ) या स्ट्रीविलाई ( Strobili ) के रूप में समूहित होते हैं । ये कोन्स प्रायः एकलिंगी ( Unisexual ) होते हैं । नर शंकु ( Cones ) माइक्रोस्पोरोफिल या लघुबीजाणु पर्ण ( Micmsporophy तथा मादा शंकु ( comes ) गुरुबीजाणुपर्ण ( Megasporophyin का निर्माण करते हैं ।
जिम्नोस्पर्म का आर्थिक महत्व
1. साइकस ( Cycas ) के तनों से मण्ड ( Starch ) निकालकर खाने वाला साबूदाना ( Sago ) का निर्माण किया जाता है ।
2. साइकस के बीज अण्डमान द्वीप के जनजातियों द्वारा खाए जाते हैं ।
3. पाइनस से प्राप्त होने वाला चिलगोजा भी खाने के काम आता है ।
4. चीड़ ( Pine ) सिकोया ( Sequcial देवदार ( Deodari कर ( Fur ) स्थूस ( Spruce ) आदि की लकड़ी महत्वपूर्ण फर्नीचर बनाने
के काम आते हैं ।
5. बीड ( Pine ) के पेड़ से तारपीन का तेल ( Terpentine Oily देवदार ( Darodar ) के पेड़ से सेइस तेल ( Cedrus oil ) तथा जूनीपेरस की लकड़ी से सडकाष्ठ तेल प्राप्त किया जाता है ।
6. टेनिन का उपयोग चमडा एवं स्याही बनाने में होता है ।
7. कुछ शंकु पौधों से रेजिन ( Resin ) प्राप्त किया जाता है ।
8 इफंड्रा ( Ephedra ) के रस से इफेड्रिन ( Ephedrine ) नामक एल्केलॉयड ( Alkaloid ) प्राप्त किया जाता है । इफेड्रिन का उपयोग दमा ( Asthma ) तथा खाँसी के रोगों में दया के रूप में होता है ।
9. कोनिफर ( Conifer ) के मुलायम रेशेदार काष्ट से लुग्दी ( Pulp ) बनाकर फिर कागज ( Paper ) बनाया जाता है । 10. बहुत से जिम्नोस्पर्म को बगीचों , पार्क तथा घर की छतों पर सुन्दरता की दृष्टि से लगाया जाता है ।
11. साइकस की पत्तियों से रस्सी तथा झाडू बनायी जाती है ।
नोट :
1. चिलगोजा को जिम्नोस्पर्म का मेवा कहा जाता है ।
2. साइकस को सागो पाम ( Sago palm ) कहा जाता है ।
3. साइकस ताड़ जैसे ( Palm like ) मरुद्भिदी पौधा है , जिसमें तना लम्बा , मोटा तथा अशाखित होता है । इनके सिरों पर अनेक हरी पत्तियाँ गोलाकार ढंग से एक मुकुट जैसी रचना बनाती हैं ।
4. कवकयुक्त पाइनस की जड़ को माइकोराइजल जड़ें ( AMycorrhizal roots ) कहते हैं ।
5. शैवाल युक्त साइकस की जड़ को कोरेलॉयड ( Corralloid ) जड़ कहते हैं ।
6. सबसे मोटा तना टेक्सोडियम मेक्सिकेनम ( Texodium mexicanum ) नामक जिम्नोस्पर्म का होता है ।
7. सबसे अधिक संख्या में गुणसूत्र ओफियोग्लोसम ( Ophioglossum ) नामक फर्न में होते हैं ।
8. साइकस ( Cycas ) को जीवित जीवाश्म
( Living fossils
) कहा जाता है ।
9. जिन्नोस्पर्म को बाह्य आकृति और आंतरिक संरचना के आधार पर साइकडी ( Cycadae ) तथा कोनीफेरी ( Coniferae ) नामक दो समूहों में बाँटा गया है ।
( a ) साइकेडी : जैसे — साइकस ( Cyeas )
( b ) कोनिफेरी : जैसे - पाइनस ( Pinus ) , सीड्स ( Cedrus ) गिंकगो ( Ginkgo ) आदि ।
( C ) आवृत्तबीजी ( Angiosperms ) : इस उप - प्रभाग के अन्तर्गत उन पौधों को सम्मिलित किया गया है जिनमें बीज सदैव फल के अंदर होते हैं । ये शाक therbs ) झाड़ियाँ ( Shrubs ) तथा वृक्ष ( Tree ) तीनों प्रकार के होते हैं । आवृतबीजी पौधों के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं
1. इनमें प्रजनन अंग पुष्प होता है ।
2 इनमें दोहरा निषेचन ( Double fertilization ) दृष्टिगत होता है ।
3. ये मृदोपजीवी ( Saprophyte ) , परजीवी ( Parasite ) सहजीवी ( Symbiotic ) कीटभक्षी ( Insectivorous ) तथा स्वपोषी ( Autotrophs ) के रूप में पाये जाते हैं ।
4. ये सामान्यतया स्थलीय पौधे होते हैं , लेकिन कुछ पौधे जल में भी पाये जाते हैं ।
5. इनमें संवहन तंत्र अति विकसित होता है ।
वर्गीकरण : आवृतबीजी पौधों को दो मुख्य वगों में विभाजित किया गया है
1. एकबीजपत्री ( Morocotyledonae ) तथा
2. द्विबीजपत्री ( Dicotyledonae )
एकबीजपत्री के प्रमुख लक्षण
1. इनके बीजों में केवल एक बीजपत्र ( Cotyledon ) उपस्थित होता है ।
2 इनकी जड़ें प्रायः अधिक विकसित नहीं होती हैं ।
3 इनके पुष्यों के माग ( Floral parts ) तीन या उसके गुणांक होते हैं ।
4. इनके संवहन पूल में कम्बियम ( Cambian , नहीं पाया जाता है ।
एकबीजपत्री के कुछ महत्वपूर्ण कुल और पौधे कुल का नाम प्रमुख पौधों के नाम ( वानस्पतिक नाम ) 1.लिलिएसी लहसुन ( Alliumsativum , प्याज ( Alliumcepal ( Liliaceae ) सतावर ( Asparagus racemosus ) आदि । 2.ग्रेमिनी गेहूँ ( Triticum aestivum ) मक्का ( Zea mays ) , ( Grantinae ) चावल ( Oryza sativa ) , गन्ना ( Saccharam officinarum ) , ज्वार ( Sorghum vulgare ) , बाजरा ( Pennisetum )

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