पादप जगत जीवों के आधुनिक वर्गीकरण ( Modern classification ) के अनुसार
जीवमण्डल ( Biosphere ) के सभी बहुकोशिकीय ( Multicellular ) , प्रकाश संश्लेषी ( Photosynthetic ) , ससीम केन्द्रकी ( Eucaryotic ) , उत्पादक ( Producer ) एवं स्वपोषी ( Autotrophic ) जीवों को पादप जगत ( Plant Kingdom ) के अन्तर्गत रखा गया है । पादप जगत में अब तक 3.5 लाख जीवों को सम्मिलित किया जा चुका है ।
आधुनिक वर्गीकरण के आधार पर पादप जगत को निम्नलिखित ढंग से विभाजित किया गया है


थैलोफाइटा ( Thallophyta ) : थैलोफाइटा के अन्तर्गत मुख्य रूप से विभिन्न प्रकार के शैवाल ( Algae ) , कवक ( Fungi ) तथा जीवाणु ( Bacteria ) आते हैं । थैलोफाइटा का शरीर जड़ , तना एवं पत्तियों में विभाजित नहीं रहता है , लेकिन यह एक थैलस ( Thallus ) के रूप में रहता है , इसलिए इन्हें यैलोफाइटा कहते हैं । इनमें संवहनीय ऊतक नहीं पाया जाता है ।


शैवाल ( Algae ) : शैवाल या एल्गी पादप जगत का सबसे सरल जलीय जीव है , जो प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा भोजन का निर्माण करता है । शैवालों के अध्ययन को फाइकोलॉजी ( Phycology ) कहते हैं । शैवाल प्रायः हरितलवक युक्त ( Cholorophyllous ) , संवहन ऊतक रहित ( Non Vascular ) स्वपोषी ( Autotrophic ) होते हैं । इनका शरीर शूकाय सदृश ( Thalloid ) होता है । ये ताजे जल , समुद्री जल , गर्म जल के झरनों , कीचड़ एवं नदी , तालाबों में पाए जाते हैं । कुछ शैवालों में गति करने के लिए फ्लेजिला ( Flagella ) पाये जाते हैं | बर्फ पर पाये जाने वाले शैवाल को क्रिप्टोफाइट्स ( Cryptophytes ) तथा चट्टानों पर पाये जाने वाले शैवाल को लिथोफाइट्स ( Lithophytes ) कहते हैं ।
प्रमुख लक्षण : शैवाल में पाये जाने वाले कुछ प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं


 1. शैवाल की कोशिकाओं में सैल्यूलोज ( Cellulose ) की बनी कोशिका - भित्ति ( Cell wal ) पायी जाती है ।           
2. शैवाल में भोज्य पदार्थों का संचय मण्ड ( Starch ) के रूप में रहता है ।
 3. इनका जननांग प्रायः एककोशिकीय ( Unicellular ) होता है और निषेचन के बाद कोई भ्रूण नहीं बनाते । 4. ये           अधिकांशतः जलीय ( समुद्री तथा अलवण जलीय दोनों ही ) होते हैं ।
 5. कुछ शैवाल नमीयुक्त स्थानों पर भी पाए जाते हैं ।
 6. इनमें प्रकाश संश्लेषण के लिए प्रायः हरा वर्णक उपस्थित रहता है ।
7. शैवालों में तीन प्रकार के वर्णक ( Pigment ) पाये जाते हैं हरा ( Green ) , लाल ( Red ) एवं भूरा ( Brown ) | इन्हीं तीन वर्णकों के आधार पर शैवालों को तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है
 ( a ) क्लोरोफाइसी ( Chlorophyceae ) हरा वर्णक
 ( b ) रोडोफाइसी ( Rhodophyceae ) लाल वर्णक
 ( c ) फीयोफाइसी ( Pheophyceae ) भूरा वर्णक

इनमें प्रजनन अलैंगिक एवं लैंगिक दोनों ही विधियों द्वारा होता है ।


 आवास ( Habitat ) : शैवाल ताजे जल , समुद्री जल , गर्म जल के झरनों , नमीयुक्त स्थानों , कीचड़ , नदियों , तालाबों आदि में पाये जाते हैं । ये पेड़ों के तनों तथा चट्टानों पर भी पाये जाते हैं । कुछ शैवाल अधिपादप ( Epiphytes ) के रूप में दूसरे पौधों पर पाये जाते हैं । जैसे - ऊडोगोनियम ( Oedogonium ) | प्रोटोडर्मा ( Protoderma ) एक ऐसा शैवाल है जो कछुए की पीठ पर उगता है । क्लेडोफोरा नामक शैवाल घोंघे के ऊपर रहता है । इतना ही नहीं कुछ शैवाल जन्तुओं के शरीर के अन्दर भी वास करते हैं , जैसे - जूक्लोरेला ( Zoocholorella ) नामक शैवाल निम्नवर्गीय जन्तु हाइड्रा ( Hydra ) के अंदर पाया जाता है । जूक्लोरेला तथा हाइड्रा का सम्बन्ध ( Association ) सहजीवन ( Symbiosis ) का उदाहरण है । कुछ शैवाल परजीवी ( Parasite ) भी होते हैं , जैसे -- सीफेल्यूरोस ( Cephaleuros ) जो चाय , कॉफी आदि की पत्तियों पर होते हैं । पेड़ों की छालों , दीवारों तथा चट्टान आदि पर साइमनसिएला ( Simon siella ) शैवाल पाया जाता है । ऑसीलेटोरिया ( Oscillatoria ) मनुष्य एवं दूसरे जन्तुओं की आंतड़ियों ( Intestine ) में पाया जाता है ।
 
 प्रजनन ( Reproduction ) : शैवालों में निम्नलिखित तीन प्रकार की प्रजनन क्रिया होती है
 1. कायिक प्रजनन ( Vegetative reproduction ) : शैवालों में कायिक प्रजनन की क्रिया खण्डन , हार्मोगोन                 ( Harmogone ) , प्रोटोनीमा ( Protonema ) तथा एकाइनेट ( Akinetes ) द्वारा होता है ।
 2. अलैंगिक प्रजनन ( Asexual reproduction ) : शैवालों में अलैंगिक प्रजनन की क्रिया चलबीजाणु ( Zoospores ) , अचलबीजाणु ( Aplanospores ) , हिप्नोस्पोर ( Hypnospores ) , ऑटोस्पोर ( Autospores ) तथा इण्डोस्पोर ( Endospores ) द्वारा होता है ।
 3. लैंगिक प्रजनन ( Sexual reproduction ) : शैवालों में लैंगिक प्रजनन की क्रिया समयुग्मक ( Isogamous ) , विषमयुग्मक ( Anisogamous ) तथा अण्डयुग्मक ( Oogarmous ) द्वारा होता है ।
शैवालों का आर्थिक महत्व ( Economic importance of algae ) ; 
 ( A ) लाभदायक शैवाल : शैवाल निम्नलिखित कारणों से मनुष्यों के लिए उपयोगी साबित होते हैं
 
1.      भोजन के रूप में ( Algae as food ) :
 
( a ) जापान के निवासी अल्वा ( Ulva ) नामक भूरे शैवाल का उपयोग सलाद के रूप में करते हैं । इस कारण अल्वा को ' समुद्री सलाद ' भी कहा जाता है । 
b ) चीन ( Scotland ) में रोडोमेरिया पल्मेटा नामक शैवाल का प्रयोग तम्बाकू ( Tobacco ) की भाँति किया जाता है
 ( d ) जापान के निवासी पोरफाइरा ( Porphyra ) नामक शैवाल का प्रयोग भोजन के रूप में करते हैं ।
 ( e ) भारतीय उपमहाद्वीप में अम्बलीकस ( Umblicus ) नामक शैवाल का उपयोग खाने के रूप में होता है ।
 ( f )  कॉन्ड्रस ( Condrus ) नामक शैवाल से आयरिश अगर ( Irish agar ) प्राप्त किया जाता है , जिसका उपयोग चाकलेट बनाने में इमल्सीफाइंग कारक के रूप में होता है ।
( g ) शैवालों में कार्बोहाइड्रेट्स , अकार्बनिक पदार्थ तथा विटामिन A , C , D.E आदि प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं , जिस कारण इनका उपयोग भोजन के रूप में होता है ।
2.      व्यवसाय में ( In industry ) :
 ( a ) अगर - अगर ( Agar - Agar ) नामक पदार्थ लाल शैवाल ( Red algae ) से प्राप्त किया जाता है , जो प्रयोगशाला ( Laboratory ) में पौधों के संवर्धन , तना जैल , आइसक्रीम आदि में प्रयुक्त होता है । यह पदार्थ तापरोधक , ध्वनि रोधक , कृत्रिम रेशे , चमडा , सूप , चटनी आदि बनाने के काम में भी आता है । अगर अगर गैसीलेरिया तथा जेलेडियम नामक शैवाल से प्राप्त किया जाता है ।
 ( b ) सारगासम नामक शैवाल से जापान में कृत्रिम ( Synthetic ) ऊन तैयार किये जाते हैं ।
 ( c ) एलीजन नामक पदार्थ शैवालों से प्राप्त किया जाता है जो वोल्केनाइजेशन ( Vulcanisation ) , टाइपराइटरों के रोलरों तथा अञ्चलनशील फिल्मों के निर्माण में काम आता है । 
 ( d ) कैराइस ( Charadrus ) नामक शैवाल से श्लेष्मिक केरोगेनिन नामक पदार्थ प्राप्त किया जाता है जो शृंगार प्रसाधनों ( Cosmetics ) , सैम्पू , जूतों की पॉलिश आदि बनाने के काम आता है ।
 ( e ) लेमीनेरिया नामक समुद्री शैवाल से आयोडीन प्राप्त किया जाता है ।
 ( f ) भूरे शैवालों में पोटैशियम क्लोराइड नामक पदार्थ उपस्थित होता है । इस कारण इनसे पोटैशियम लवण निकाले जाते हैं ।
 ( g ) शैवालों के किण्वन से एसीटिक अम्ल प्राप्त किया जाता है ।
3.      कृषि के क्षेत्र में ( InAgriculture ) :
 ( a ) नॉस्टोक ( Nostoc ) , एनाबीना ( Anabena ) आदि शैवाल नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता रखते हैं । ये वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं ।
 ( b ) नील हरित शैवाल ( Blue green algae ) का उपयोग ऊसर भूमि को उपजाऊ भूमि में परिणत करने में होता है । नॉस्टोक इसका सबसे अच्छा उदाहरण है ।
 ( c ) कुछ शैवालों का उपयोग खाद ( Manure ) के निर्माण में किया जाता है ।
 4 . औषधि के रूप में ( AS Medicine ) :
 ( a ) कारा ( Chara ) तथा नाइट्रेला ( Niterella ) नामक शैवाल मलेरिया उन्मूलन में उपयोगी सिद्ध होते हैं ।
 ( b ) क्लोरेला ( Chlorella ) नामक शैवाल से क्लोरेलीन ( Chlorelline ) नामक एक प्रतिजैविक ( Antibiotic ) पदार्थ प्राप्त किया जाता है ।
      5.       अनुसंधान कार्यों में ( As in Biological research ) :
 
 कस्तोरेला , एसिटाबुलेरिया ( Acetabularia ) , दैलोनिया ( Valonia ) आदि शैवालों का प्रयोग जीव विज्ञान के क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के अनुसंधानों में किया जाता है । क्लोरेला ( Chlorella ) प्रकाश संश्लेषण की क्रिया से , एसिटाबुलेरिया ( Acetabularia ) केन्द्रक की खोज से तया वैलोनिया ( Valania ) जीवद्रव्य की खोज से सम्बन्धित है ।
6. मवेशियों के चारा के रूप में ( As fodder ) :

  सारगासम ( Sargassam ) नामक भूरी शैवाल तथा कुछ अन्य लाल शैवाल मवेशियों के चारे ( Fodder ) के रूप में प्रयोग की जाती है ।
 7. भूमि के निर्माण में ( In pedogenesis ) :
 
 कैल्सियम युक्त लाल शैवालों के मृत शरीर से भूमि ( मृदा ) का निर्माण होता है ।
 
 ( B ) हानिकारक शैवाल : शैवालों से प्रमुख हानियाँ निम्नलिखित है
( a ) कुछ शैवाल जलाशयों में प्रदूषण को बढ़ाते हैं , जिससे जलाशयों का जल पीने योग्य नहीं रह जाता है । ये शैवाल एक प्रकार का विष का परित्याग करते हैं , जिस कारण जलाशयों की मछलियाँ मर जाती हैं ।
 ( b ) सिफेल्यूरॉस ( Cephaleuros ) नामक शैवाल चाय के पौधों पर लाल किट्ट रोग ( Red rust of tea ) नामक पादप रोग उत्पन्न करती है , जिससे चाय उद्योग को गम्भीर हानि होती है ।
 
 ( c ) वर्षा ऋतु के दौरान शैवालों के कारण भूमि हरे रंग की दिखने लगती है और यह फिसलाव हो जाती है ।
 
 नोट :
 
 1. एसिटायलेरिया सबसे छोटा एककोशिकीय शैवाल है ।
 2. मैक्रोसिष्टिस सबसे बड़ा शैवाल है । इस शैवाल को ' दैत्याकार समुवी यास ' भी कहा जाता है ।
 3. सबसे छोटा गुणसूत्र ट्रीलियम ( Thilium ) नामक शैवाल का होता है ।
 4. नाइट्रोजन स्थिरीकरण ( Nitrogen fixation ) करने वाले नील हरित शैवाल धान के खेतों में पाये जाते हैं ।
 5. ट्राइकोडेस्मियम इरीश्रीरियम ( Trichodesmium erythrium ) नामक नील - हरित शैवाल लाल सागर में जल के ऊपर तैरता रहता है और उन्हें लाल ( Red ) रंग प्रदान करता है , इस कारण इस सागर को लाल सागर ' का नाम दिया गया है ।
 6. बलोरेला ( Chlorella ) नामक शैवाल को अतरिक्ष शैवाल ( Space Algae ) के नाम से जाना जाता है । अन्तरिक्ष यात्रा के दौरान अंतरिक्ष यान के केबिन के हॉज में इसे उगाकर प्रोटीनयुक्त भोजन , जल और ऑक्सीजन प्राप्त किया जाता है ।
7. अल्या ( Ulva ) को साधारण सलाद ( Sea lettuce ) कहते हैं ।
 8. नीलहरित शैवालकानया नामसाइनोबैक्टिरिया ( Cyanobacteria ) दिया गया है ।
 9. बर्फपर उगने वाले शैवालों को कायोफाइटिक शैवाल ( Cryophytic algae ) कहते हैं ।
10 , मैक्रोसिस्टिस ( Macrocystis ) और नेरिओसिस्टिस ( Nareocystis ) को Giant Kelps कहते हैं ।
 11. माइक्रोसिस्टिस ( Microcystis ) ओसीलेटोरिया । scillatorial लिंगविया ( Lingbya ) आदि शैवालों के कारण Water bloons बनते हैं ।
 12. शैवाल हिमशिखरों को भिन्न - भिन्न रंग प्रदान करते हैं ।जैसे
 Red snow - Haematococcus nivatis
 Yellow snow --- Chalamydomonas Yellow stonensis )
Green snow - Rahinodema 

ब्रायोफाइटा ( Bryophyta ) : ब्रायोफाइटा भ्रूण ( Embryo ) बनाने वाले पौधों का सबसे साधारण व आध ( Primitive ) समूह है । इनमें संवहन ऊतक ( Vascular tissue ) नहीं होता है । ये पौधे स्थलीय ( Terrestrial ) होने के साथ छायादार एवं नम ( Moist ) स्थानों पर उगते हैं । इन्हें अपने जीवन काल में पर्याप्त आर्द्रता की आवश्यकता

होती है । अतः कुछ वैज्ञानिक आयोफाइटा समुदाय को वनस्पति जगत का एम्फीबिया वर्ग कहते है । इन्हें प्रथमस्थलीय पौधा माना जाता है । इनका मुख्य पौधा युग्मकोद्भिद् ( Gametophyte ) होता है । इस वर्ग के सदस्यआकार में सूक्ष्म होते हैं । इस वर्ग का सबसे बड़ा पौधा डॉसोनिया ( Dain'sonia ) है । युग्मकोद्भिद् ( Gametophyte ) के मूलाभासों को छोड़कर शेष भाग में हरित लवक ( Chloroplast ) होते हैं , जिसके कारण ये स्वपोषी ( Autotrophs ) होते हैं । युग्मकोद्भिद् में विविध प्रकार का वर्षीजनन ( vegetative reproduction ) होता है , जैसे विखण्डन , जेमा ( Gemma ) , ट्यूबर ( Tuber ) प्रोटोनीमा ( Protonema ) , पत्र - प्रफलिका ( Bulbil ) द्वारा आदि । प्रायोफाइट्स छोटे चैलसनुमा ( Thallus like ) होते हैं । इनमें तने एवं पत्तियों की तरह रचनाएँ मिलती हैं । इनमें जड़ें हमेशा अनुपस्थित रहती हैं , किन्तु थैलस के अध्यक्ष ( Ventral ) सतह से तन्तु की तरह की कई रचनाएँ निकलती हैं , जिन्हें मूलांग ( Rhizodes ) कहा जाता है । ये पौधों को स्थिर रखने तथा मृदा से खनिज लवण का अवशोषण करने में सहायक होती है । ब्रायोफाइट्स में पीढ़ी एकान्तरण ( Alteration of generation ) स्पष्ट रूप से पाया जाता है । ये दोनों पीढ़ियाँ युग्मकोद्भिद् ( Gametophytel तथा बीजाणुद्भिद ( Sporophyte ) कहलाती है ।

 बायोफाइटा का आर्थिक महत्व 

1. द्रायोफाइटा वर्ग के पौधे मृदा अपरदन ( Soil erosion ) को रोकने में सहायता प्रदान करते हैं । 

2. ब्रायोफाइटा वर्ग के पौधों में जल अवशोषण की पर्याप्त समता होती है । अतः ये बाढ़ ( Flood ) रोकने में सहायता करती हैं । 

3. स्फेगनम ( Sphagnum ) जैसे ब्रायोफाइट्स का प्रयोग ईंधन के रूप में किया जाता है । 

4. एस्किमो जनजाति समुदाय स्फेगनम का प्रयोग चिराग में बत्ती की जगह करते हैं ।

5. मॉस ( Moss ) का प्रयोग एन्टिसेप्टिक ( Antiseptic ) के रूप में किया जाता है । 

6. शाकाहारी स्तनधारी कुछ प्रायोफाइट्स पौधे का प्रयोग भोज्य पदार्य के रूप में करते हैं ।

ब्रायोफाइटा का वर्गीकरण ( Classification of Dryophyta ) ; ब्राचोफाइटा को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है 

1. हिपेटोकोप्सिडा ( Hepatocopsida ) या लिवरवर्ट ( Liver Twrort ) : इसके अन्तर्गत रिक्सिया ( Riccia ) , मार्केन्सिया ( Marchential , पोरेला ( Porella ) आदि आते हैं । 

2 एन्योसिरोटोप्सिडा ( Anthocerotopsida ) या हार्नवर्ट ( Horm merort ) : इसके अन्तर्गत एन्थोसिरोस ( Anthoceros ) आता है ।

3. ब्रायोसिडा ( Bryopsida ) या मॉस ( Mass ) : इसके अन्तर्गत स्फेगनम ( Sphagnum ) , फ्यूनेरिया ( Funaria ) आदि जैसे प्रायोफाइट्स आते हैं ।

 नोट : 1 प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान स्फेगनम का प्रयोग सई की जगह घाव को भरने के लिए किया गया था ।

2. डाउसोनिया सबसे बड़ा प्रायोफाइटा तथा जूओप्सिस ( Zoopsis ) सबस छोटा ब्रायोफाइटा है । 

3. संवहन तंत्र का न होना बायोफाइटा का विशिष्ट लक्षण है ।

 ट्रैकियोफाइटा ( Tracheophyta ) : ट्रैकियोफाइटा प्रभाग में उन पादपों को सम्मिलित किया गया है जिनमें संवहनी ऊतक ( Vascular tissue ) पाये जाते हैं । इस प्रभाग में अब तक 2.75 लाख जातियों की खोज की जा चुकी है । इस प्रभाग को पुनः तीन उप - प्रभाग में विभाजित किया गया है

1. टेरिडोफाइटा ( Preridophyta )

 2. अनावृत्तबीजी ( Gymnosperm ) तथा 

3. आवृत्तबीजी ( Angiosperm )

टेरिडोफाइटा ( Pteridophyta ) : इस उप - प्रभाग में अपुष्पोभिद् ( Cryptogamous ) पादपों को रखा गया है । इस उप - प्रभाग के सदस्यों में जल एवं खनिज लवण के संवहन हेतु संवहन ऊतक ( Vascular tissue ) पाये जाते हैं । इस उप - प्रभाग के पादपों में पाये जाने वाले प्रमुख लक्षण निम्नलिखित है 

1. इनका शरीर जड , तना एवं पत्ती में विभाजित रहता है । 

2. इनमें संवहन ऊतक जाइलम ( Xplem ) एवं फलोएम ( Phloem ) में बँटा रहता है ।

3. इनमें पुष्प और बीज का निर्माण नहीं होता है । 

4. इनमें मुख्य पौधा बीजाणुभिद् ( Sporophyte ) होता है जिसमें प्रायः जड़ , तना ( स्तम्भ ) तथा पत्ते होते हैं ।

5. इनमें बीजाणु ( Spores ) बीजाणुधानियों ( Sporangia ) में उत्पन्न होते हैं । 

6. बीजाणुधानियाँ ( Spporangia ) जिस पत्ती पर उत्पन्न होती हैं . उस पत्ती को बीजाणुपर्ण ( Sporophy ) कहते हैं । 7. युग्मोभिद् ( Gametophyte ) पौधे पर नर जननांग पुंधानी ( Antheridium तथामादाजननांग स्त्रीधानी ( Archegorium ) उत्पन्न होते हैं । 

8. इन पौधों में एक निश्चित पीढ़ी एकान्तरण ( Altration of generation ) होता है । 

9. जाइगोट ( Zygote ) में जाइगोस्पोर ( Zygospore ) का निर्माण होता है । टेरिडोफाइटा को चार उपफाइलम में विभाजित किया गया है 

1. साइलोप्सिडा ( Psilopsida ) : जैसे साइलोटम 

2. लाइकोप्सिता ( Lycopsida ) : जैसे - लाइकोपोडियम 

3. स्फिनोसिडा ( Sphenopsida ) : जैसे -- इक्वीसेंटम 

4.टेरोप्सिडा ( Pteropsida ) : जैसे - ड्रायोप्टेसिस या फर्न

टेरिडोफाइटा का आर्थिक महत्व 

1. लाइकोपोडियम के बीजाणु दवाई के रूप में प्रयोग किये जाते हैं । 

2 मासिलिया ( Marsilea ) तथा सिरेटोप्टेरिस ( Ceratopteris ) जैसे टेरिडोफाइट्स का उपयोग सब्जी के रूप में होता है । 

3. टेरिडियम का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में होता है ।

4. सिलेजिनेला ( Selaginella ) में पुनर्जीवन का गुण पाया जाता है । इस कारण इसका उपयोग मेजों पर सजावट हेतु किया जाता है । 5. इक्विसेटम ( Equisetum ) नामक टेरिडोफाइट्स से सोना प्राप्त किया जाता है । 

नोट :

1. फर्न टेरिडोफाइटा वर्ग का सबसे विख्यात पौधा है ।

2. टेरिडोफाइटा का सबसे पहला जीवाश्म Late Paleozoic काल के सिलुरियन अवधि ( Silurian perior ) में देखा गया था । इस कारण Late paleoroic को Age of Pteridophytes कहा जाता है ।

3. भारतीय टेरिडोफाइट जीवाश्मों का विस्तृत अध्ययन सुरंज ( Surange ) नामक वनस्पतिशास्त्री द्वारा किया गया है । 4. टेरिडोफाइटा को विकसित वीजरहित पौधा कहा जाता है । 

अनावृत्तबीजी ( Gymnosperms ) : अनावृत्तबीजी ( Cymme sperms ) बीजीय पौधों ( Spermatophytes ) का यह सब - फाइलम है , जिसके अन्तर्गत वे पौधे आते हैं , जिनमें नग्न बीज आते हैं , अर्थात् बीजाण्ड ( Ovules ) तथा उनसे विकसित बीज किसी खोल या फल में बन्द नहीं होते हैं । इनमें अंडाशय ( Ovary ) का पूर्ण अभाव होता है । यह पुराने पौधों का वर्ग है । इस उप - प्रभाग में लगभग 900 जातियों को रखा गया है । इसके प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं 1. इस उप प्रभाग के पौधे बहुवर्षीय ( Pereranial ) होते हैं ।

2. वे मरुभिद् ( Xerophytic ) स्वभाव के होते हैं ।

3. इनमें स्पष्ट वार्षिक बल ( Annual rings ) बनते हैं ।

4. इनके बीजों में वीजावरण नहीं पाया जाता है । 

5. इनमें संवहन ऊतक ( Vascular tissue ) पाये जाते हैं ।

6 ये नग्नबीजी तथा आशाखित होते हैं ।

7. इनमें वायु परागण ( Anemophilly होता है ।

8. इनमें साधारण तथा बहुभ्रूणता ( Polyembryony ) पायी जाती है ।

9. भ्रूण ( Embryo ) से मूलांकुर ( Radicle ) तथा प्राकुर ( Plumule ) के साथ ही एक या एक से अधिक बीजपत्र बनते हैं । 

10. साइकस ( Cycas ) में काष्ठ ( Wood ) मेनोजाइलिक ( Manoxylic ) तथा पाइनस ( Pinus ) में पिक्नोजाइलिक ( Pycmoxylic ) होती है । 

11. साइकब की कोरेलॉयड ( Coralloid ) जड़ों से नील हरित शैवाल एनाबीना ( Anabena ) तथा नॉस्टोक ( Nastoc ) पाये जाते हैं , जो सहजीवी ( Symbiotic ) सम्बन्ध प्रदर्शित करते हैं । 

12 सबसे बड़ा अण्डाणु तथा शुक्राणु साइकस का होता है , जो कि एक जिम्नोस्पर्म है ।

13. इनमें जननांग , कोन्स ( Cones ) या स्ट्रीविलाई ( Strobili ) के रूप में समूहित होते हैं । ये कोन्स प्रायः एकलिंगी ( Unisexual ) होते हैं । नर शंकु ( Cones ) माइक्रोस्पोरोफिल या लघुबीजाणु पर्ण ( Micmsporophy तथा मादा शंकु ( comes ) गुरुबीजाणुपर्ण ( Megasporophyin का निर्माण करते हैं ।

 जिम्नोस्पर्म का आर्थिक महत्व 

1. साइकस ( Cycas ) के तनों से मण्ड ( Starch ) निकालकर खाने वाला साबूदाना ( Sago ) का निर्माण किया जाता है । 

2. साइकस के बीज अण्डमान द्वीप के जनजातियों द्वारा खाए जाते हैं । 

3. पाइनस से प्राप्त होने वाला चिलगोजा भी खाने के काम आता है । 

4. चीड़ ( Pine ) सिकोया ( Sequcial देवदार ( Deodari कर ( Fur ) स्थूस ( Spruce ) आदि की लकड़ी महत्वपूर्ण फर्नीचर बनाने के काम आते हैं ।

5. बीड ( Pine ) के पेड़ से तारपीन का तेल ( Terpentine Oily देवदार ( Darodar ) के पेड़ से सेइस तेल ( Cedrus oil ) तथा जूनीपेरस की लकड़ी से सडकाष्ठ तेल प्राप्त किया जाता है ।

6. टेनिन का उपयोग चमडा एवं स्याही बनाने में होता है । 

7. कुछ शंकु पौधों से रेजिन ( Resin ) प्राप्त किया जाता है ।

8 इफंड्रा ( Ephedra ) के रस से इफेड्रिन ( Ephedrine ) नामक एल्केलॉयड ( Alkaloid ) प्राप्त किया जाता है । इफेड्रिन का उपयोग दमा ( Asthma ) तथा खाँसी के रोगों में दया के रूप में होता है ।

 9. कोनिफर ( Conifer ) के मुलायम रेशेदार काष्ट से लुग्दी ( Pulp ) बनाकर फिर कागज ( Paper ) बनाया जाता है । 10. बहुत से जिम्नोस्पर्म को बगीचों , पार्क तथा घर की छतों पर सुन्दरता की दृष्टि से लगाया जाता है । 

11. साइकस की पत्तियों से रस्सी तथा झाडू बनायी जाती है ।

 नोट : 

1. चिलगोजा को जिम्नोस्पर्म का मेवा कहा जाता है । 

2. साइकस को सागो पाम ( Sago palm ) कहा जाता है ।

3. साइकस ताड़ जैसे ( Palm like ) मरुद्भिदी पौधा है , जिसमें तना लम्बा , मोटा तथा अशाखित होता है । इनके सिरों पर अनेक हरी पत्तियाँ गोलाकार ढंग से एक मुकुट जैसी रचना बनाती हैं । 

4. कवकयुक्त पाइनस की जड़ को माइकोराइजल जड़ें ( AMycorrhizal roots ) कहते हैं । 

5. शैवाल युक्त साइकस की जड़ को कोरेलॉयड ( Corralloid ) जड़ कहते हैं । 

6. सबसे मोटा तना टेक्सोडियम मेक्सिकेनम ( Texodium mexicanum ) नामक जिम्नोस्पर्म का होता है ।

7. सबसे अधिक संख्या में गुणसूत्र ओफियोग्लोसम ( Ophioglossum ) नामक फर्न में होते हैं ।

8. साइकस ( Cycas ) को जीवित जीवाश्म ( Living fossils ) कहा जाता है ।

9. जिन्नोस्पर्म को बाह्य आकृति और आंतरिक संरचना के आधार पर साइकडी ( Cycadae ) तथा कोनीफेरी ( Coniferae ) नामक दो समूहों में बाँटा गया है । 

( a ) साइकेडी : जैसे साइकस ( Cyeas )

 ( b ) कोनिफेरी : जैसे - पाइनस ( Pinus ) , सीड्स ( Cedrus ) गिंकगो ( Ginkgo ) आदि । 

( C ) आवृत्तबीजी ( Angiosperms ) : इस उप - प्रभाग के अन्तर्गत उन पौधों को सम्मिलित किया गया है जिनमें बीज सदैव फल के अंदर होते हैं । ये शाक therbs ) झाड़ियाँ ( Shrubs ) तथा वृक्ष ( Tree ) तीनों प्रकार के होते हैं । आवृतबीजी पौधों के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं 

1. इनमें प्रजनन अंग पुष्प होता है ।

2 इनमें दोहरा निषेचन ( Double fertilization ) दृष्टिगत होता है ।

3. ये मृदोपजीवी ( Saprophyte ) , परजीवी ( Parasite ) सहजीवी ( Symbiotic ) कीटभक्षी ( Insectivorous ) तथा स्वपोषी ( Autotrophs ) के रूप में पाये जाते हैं ।

4. ये सामान्यतया स्थलीय पौधे होते हैं , लेकिन कुछ पौधे जल में भी पाये जाते हैं । 

5. इनमें संवहन तंत्र अति विकसित होता है ।

 वर्गीकरण : आवृतबीजी पौधों को दो मुख्य वगों में विभाजित किया गया है

1. एकबीजपत्री ( Morocotyledonae ) तथा 

2. द्विबीजपत्री ( Dicotyledonae )

एकबीजपत्री के प्रमुख लक्षण 

1. इनके बीजों में केवल एक बीजपत्र ( Cotyledon ) उपस्थित होता है । 

2 इनकी जड़ें प्रायः अधिक विकसित नहीं होती हैं ।

3 इनके पुष्यों के माग ( Floral parts ) तीन या उसके गुणांक होते हैं ।

4. इनके संवहन पूल में कम्बियम ( Cambian , नहीं पाया जाता है ।

एकबीजपत्री के कुछ महत्वपूर्ण कुल और पौधे कुल का नाम प्रमुख पौधों के नाम ( वानस्पतिक नाम ) 1.लिलिएसी लहसुन ( Alliumsativum , प्याज ( Alliumcepal ( Liliaceae ) सतावर ( Asparagus racemosus ) आदि । 2.ग्रेमिनी गेहूँ ( Triticum aestivum ) मक्का ( Zea mays ) , ( Grantinae ) चावल ( Oryza sativa ) , गन्ना ( Saccharam officinarum ) , ज्वार ( Sorghum vulgare ) , बाजरा ( Pennisetum )


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