अकार्बनिक रसायन ( ​Inorganic chemistry )

 तत्वों का आवर्ती वर्गीकरण आवर्ती वर्गीकरण ( Periodic Classification ) : किसी मौलिक गुण को आधार बनाकर की गई पदार्थों की ऐसी व्यवस्था जिसमें निश्चित अंतराल के बाद समान गुण वाले पदार्थ पुनः उपस्थित हों , आवर्ती व्यवस्था या आवर्ती वर्गीकरण कहलाती है । तत्वों के वर्गीकरण का मुख्य उद्देश्य समान गुणों वाले तत्वों को एक वर्ग में रखकर रसायनशास्त्र के अध्ययन को सरल , सुविधाजनक , सुस्पष्ट एवं क्रमबद्ध बनाना है । तत्वों के वर्गीकरण का इतिहास : 19 वीं शताब्दी में तत्वों के वर्गीकरण के कई प्रयास किये गए जिनमें प्राउट की परिकल्पना , डोबरेनर का त्रिक सिद्धांत , डूमा की सममूलक श्रेणी , न्यूलैण्डस का अष्टक नियम , लोधर मेयर का परमाणु आयतन तथा परमाणु भार वक्र , मेंडलीफ का आवर्त नियम आदि प्रमुख हैं । तत्वों के वर्गीकरण के इन प्रारम्भिक प्रयासों में तत्वों के परमाणु भार ( Atomic Weight ) को वर्गीकरण का आधार बनाया गया ।

 लेकिन डोबरेनर का त्रिक सिद्धात कुछ ही तत्वों तक सीमित रहने के कारण विश्वव्यापी मान्यता प्राप्त नहीं कर सका । अत : कुछ समय पश्चात् तत्वों के वर्गीकरण की यह पद्धति त्याग दी गई । इमा के विचार को भी व्यापक मान्यता नहीं मिल सकी और अंततः इसे भी त्याग दिया गया । न्यूलैंड्स द्वारा किए गए तत्वों के वर्गीकरण की पद्धति में अनेक त्रुटियाँ सामने आईं जिस कारण यह नियम अधिक प्रचलित नहीं हो सका और आगे चलकर इसे त्याग दिया गया ।

 अष्टक नियम के दोष

 1. यह अधिक परमाणु भार वाले तत्वों पर लागू नहीं होता है ।

 2. अक्रिय गैसों की खोज हो जाने पर नवम् तत्व प्रथम तत्व के समान गुण वाला होता न कि आठवें तत्व के । 


मैंडलीफ द्वारा तत्वों का वर्गीकरण : 19 वीं शताब्दी के मध्य में महान् रशियन वैज्ञानिक डी . आई . मैंडलीफ ने तत्वों तथा उनके यौगिकों के तुलनात्मक अध्ययन से एक नियम प्रस्तुत किया , जिसे ' मैडलीफ का आवर्त नियम कहते हैं । इस नियम के अनुसार - तत्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुण उनके परमाणु भारों के आवर्त फलन होते हैं । दूसरे शब्दों में , यदि तत्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु भारों के क्रम में सजाया जाए , तो उनकी एक निश्चित संख्या के बाद लगभग समान गुण वाले तत्व पाये जाएँगे ।


 मैंडलीफ ने उस समय तक ज्ञात तत्वों को अपने आवर्त नियम के अनुसार एक सारणी के रूप में शृखलाबद्ध किया जिसे आवर्त सारणी ( Periodic Table ) कहते हैं । मैंडलीफ की आवर्त सारणी में उदग्न ( Vertical ) तथा क्षैतिज ( Horizontal ) दो प्रकार की कतारें हैं | उदग्र कतारों को वर्ग ( Groups ) तथा क्षैतिज कतारों को आवर्त ( Periods ) कहते हैं । मैंडलीफ द्वारा निर्मित आवर्त सारणी में 9 वर्ग तथा 7 आवर्त है । मैंडलीफ के समय तक ज्ञात तत्वों की संख्या 63 थी , उस समय अक्रिय गैसों का आविष्कार नहीं हो पाया था । मैंडलीफ ने बहुतेरे अज्ञात तत्वों के लिए अपने आवर्त सारणी में रिक्त स्थान छोड़ दिए थे । मैंडलीफ की आवर्त सारणी के गुण

मैंडलीफ की आवर्त सारणी में वह सबकुछ है , जो एक सफल वर्गीकरण में होना चाहिए । इसके प्रमुख गुण निम्नांकित हैं 

1. तत्वों के अध्ययन में सुविधा 

2. नए तत्वों की भविष्यवाणी

 3. अनुसंधान कार्य में सहायता 

4. संशयात्मक परमाणु भारों का संशोधन 

5. तत्वों के यौगिकों की प्रकृति की जानकारी 

6. तत्वों की संयोजकता संबंधी निर्णय 

मैंडलीफ की आवर्त सारणी के दोष 

मैंडलीफ द्वारा निर्मित आवर्त सारणी के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं 

1. आवर्त सारणी में हाइड्रोजन का स्थान विवादपूर्ण है  

2. आवर्त सारणी में समस्थानिकों ( Isotopes ) के लिए कोई स्थान नियत नहीं है । 

3. कुछ समान गुण वाले तत्वों ( जैसे- Cu एवं Hg , Ag एवं TI , Au एवं Pt तथा Ba एवं Pb ) को आवर्त सारणी के अंदर भिन्न - भिन्न वर्गों में रखा गया है । 

4. आवर्त सारणी में तत्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु भारों के क्रम में रखा गया है , किन्तु कुछ स्थितियों में इस नियम का पालन नहीं हो पाया है । अधिक परमाणुभार वाले तत्वों को कम परमाणु भार वाले तत्वों के पहले रखा गया है , जैसे- आयोडीन ( 126.92 ) की टेल्यूरियम ( 127.61 ) के बाद रखा गया है ।

5. आठवें वर्ग में तीन - तीन तत्वों को एक साथ रखा गया है , इससे आवर्त सारणी में अनियमितता उत्पन्न हो जाती है ।

 6. दुर्लभ मृदा तत्वों को एक ही साथ वर्ग IIIA में रखा गया है ।

 7. मैंडलीफ की आवर्त सारणी में धातु एवं अधातु तत्वों के बीच कोई स्पष्ट विभाजन रेखा नहीं है ।

आधुनिक आवर्त नियम ( Modern Periodic Law ) : परमाणु संरचना के अध्ययन के संदर्भ में ब्रिटिश वैज्ञानिक मोसले ( Mosley ) ने 1913 ई . में तत्वों के एक नए विशिष्ट गुण की खोज की । इसका नाम उन्होंने परमाणु संख्या ( Atomic Number ) दिया उन्होंने बताया कि किसी तत्व की परमाणु संख्या उस तत्व के एक परमाणु में उपस्थित प्रोटॉनों या इलेक्ट्रॉनों की संख्या के समान होती है । किसी तत्व के लिए परमाणु संख्या का मान स्थिर होता है । किन्हीं दो तत्वों की परमाणु संख्या एक नहीं होती है । अतः परमाणु संख्या ही किसी तत्व का मौलिक गुण है न कि परमाणु द्रव्यमान | अतः मैंडलीफ के पश्चात् परमाणु संख्या को आधार मानकर तत्वों के वर्गीकरण के प्रयास किए गए । आधुनिक आवर्त नियम परमाणु संख्या आवर्त तत्वों की संख्या पर ही आधारित है । आधुनिक आवर्त नियम के अनुसार - तत्वों के भौतिक एवं रासायनिक गुण उनकी परमाणु संख्या के आवर्त फलन होते हैं । आधुनिक आवर्त नियम के प्रतिपादन से मैंडलीफ की आवर्त सारणी के अधिकांश दोष दूर हो जाते हैं । इलेक्ट्रॉनिक विन्यास तत्वों के आधुनिक आवर्ती वर्गीकरण का शेष तत्व मूल आधार है । 

आधुनिक आवर्त सारणी में 7 क्षैतिज कतारें ( अर्थात् आवत ) तथा 18 उदग्र स्तम्भ ( अर्थात् वग ) हैं , प्रत्येक आवर्त का प्रथम सदस्य क्षार धातु तथा अंतिम सदस्य कोई निष्क्रिय गैस ( Inert gas ) होता है । पहले आवर्त का प्रथम सदस्य सिर्फ हाइड्रोजन ( H ) है ।

 परमाणु संख्या 58 से लेकर 71 तक तथा 90 से लेकर 103 तक वाले तत्वों को आवर्त सारणी के नीचे अलग - अलग कतारों में रखा गया है ।

 मंडलीफ की आवर्त सारणी और आधुनिक आवर्त सारणी में अंतर

     मैंडलीफ की आवर्त सारणी 

1. मैडलीफ की आवर्त सारणी में तत्वों को उनके परमाणु भार के बढ़ते क्रममें सजाकर तैयार किया गया 

2. इसमें कुल 9 वर्ग हैं ।

3. इस आवर्त सारणी में धातु एवं अधातु तत्वों के बीच स्पष्ट विभाजन रेखा नहीं है । 

4. इस आवर्त सारणी में सामान्य तत्व एवं संक्रमण तत्व अलग अलग नहीं प्रदर्शित किये गए हैं । 

5. आवर्त सारणी तैयार करते समय मैंडलीफ को तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास की जानकारी नहीं थी । अतः इस आवर्त सारणी में तत्वों की सजावट का आधार इलेक्ट्रॉनिक विन्यास नहीं है । 

आधुनिक आवर्त सारणी   

1. आधुनिक आवर्त सारणी में को उनके परमाणु भार के बढ़ते तत्वों को उनके परमाणु संख्या क्रम में सजाकर तैयार किया गया के बढ़ते क्रम में सजाकर तैयार किया गया है 

 2. इसमें कुल 18 वर्ग हैं ।

3. इस आवर्त सारणी में धातु अधातु तत्वों के बीच स्पष्ट एवं अधातु तत्वों के स्थान विभाजन रेखा नहीं है । अलग - अलग है एवं इनके बीच स्पष्ट विभाजन रेखा खींची जा सकती है ।

4. इस आवर्त सारणी में सामान्य एवं संक्रमण तत्व अलग अलग नहीं तत्व एवं संक्रमण तत्व अलग प्रदर्शित किये गए हैं । अलग प्रदर्शित किये गए हैं । 

5. आधुनिक आवर्त सारणी मैडलीफ को तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक ( दीर्घ रूप ) का निर्माण तत्वों विन्यास की जानकारी नहीं थी । के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के अतः इस आवर्त सारणी में आधार पर किया गया है । तत्वों की सजावट का आधार इलेक्ट्रॉनिक विन्यास नहीं है । 

.  दहन के लिए आवश्यक शर्ते : दहन की क्रिया के लिए निम्नलिखित तीन शर्ते आवश्यक हैं -1 . दहनशील पदार्थ की उपस्थिति , 2. दहन के पोषक पदार्थ की उपस्थिति , 3. ज्वलन ताप की प्राप्ति दहन के प्रकार : दहन के निम्नलिखित प्रकार होते हैं

 1. द्रुत दहन ( Rapid Combustion ) : दहन की वह क्रिया जिसमें ऊष्मा एवं प्रकाश अल्प समय में उत्पन्न होते हैं , द्रुत दहन कहलाता है । जैसे - माचिस की तीली का जलना , पटाखों का फूटना आदि ।

 2. मंद दहन ( Slow Combustion ) : दहन की वह क्रिया जो बहुत धीरे - धीरे सम्पादित होती है , मंद दहन कहलाता है । श्वसन मंद दहन का अच्छा उदाहरण है ।

 3. स्वतः दहन ( AutoCombustion ) : दहन की वह क्रिया जो बिना किसी बाहरी ऊष्मा के सम्पादित होती है , स्वतः दहन कहलाता है , जैसे — फॉस्फोरस का चलन ।

 4. विस्फोट ( Explosion ) : दहन की वह क्रिया जो बाहरी दाब या प्रहार के प्रभाव से होती है , विस्फोट कहलाता है , जैसे — पटाखों का फूटना , बम का फूटना आदि ।

 रॉकेट ईंधन ( Rocket Fuels ) : रॉकेट ईंधन को प्रणोदक ( Propellants ) कहते हैं । रॉकेट के प्रणोदन ( Propulsion ) के लिए प्रणोदक ऊर्जा प्रदान करते हैं । प्रणोदक वैसे ईधन हैं , जिनके जलने पर अत्यधिक मात्रा में गैसें एवं ऊर्जा उत्पन्न होती हैं , तथा इनका दहन बहुत तीव्र गति से होता है एवं दहन के पश्चात कोई अवशेष नहीं बचता है । प्रणोदक के दहन के फलस्वरूप उत्पन्न गैसें रॉकेट के पिछले भाग से जेट ( Jet ) के रूप में बहुत तीव्र गति से बाहर निकलती हैं , जिससे रॉकेट का इच्छित दिशा में प्रणोदन होता है ।

 प्रणोदक दो प्रकार के होते हैं :

 1. द्रव प्रणोदक ( Liquid Propellants ) तथा 

2. ठोस प्रणोदक ( Solid Propellants )

 ऐल्कोहॉल , द्रव हाइड्रोजन , द्रव अमोनिया , किरोसिन , हाइड्राजीन आदि द्रव प्रणोदक के प्रमुख उदाहरण हैं ।

 बायो गैस ( Bio Gas ) : जानवरों और पेड़ पौधों से प्राप्त व्यर्थ पदार्थ सूक्ष्म जीवों द्वारा जल की उपस्थिति में आसानी से सडले हैं और इस प्रक्रिया में मिथेन , कार्बन डाइऑक्साइड , हाइड्रोजन , हाइड्रोजन सल्फाइड आदि गैसें निकलती हैं । इस गैसीय मिश्रण को बायो गैस कहते हैं । इसमें लगभग 65 % मिथेन होता यह एक उत्तम गैसीय ईधन है । बायो गैस जलने पर धुआँ उत्पन्न नहीं करता है , साथ ही साथ इसके जलने से पर्याप्त ऊष्मा प्राप्त होती है । इसे घरेलू उपयोग में लाने के लिए किसी प्रकार की असुविधा नहीं होती है । बायो गैस की समाप्ति के पश्चात संयंत्र में अवशिष्ट पदार्थ में नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस के कई चौगिक रहते हैं । अतः अवशिष्ट पदार्थों का उपयोग उर्वरक के रूप में किया जाता है । अतः बायो गैस काफी उपयोगी गैस है ।

                                                   

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