“ क्यों ? ”

                                   लोग पीपल के वृक्ष की पूजा क्यों करते हैं ?

 पीपल का वृक्ष सब वृक्षों में पवित्र माना गया है । हिन्दुओं की धार्मिक आस्था के अनुसार भगवान विष्णु का पीपल के वृक्ष में निवास है । श्रीमद भगवद् गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि वृक्षों में मैं पीपल हूँ । स्कन्ध पुराण में बताया गया है कि पीपल की जड़ में विष्णुजी , तने में केशव ( कृष्णजी ) , शाखाओं में नारायण , पत्तों में भगवान हरि और फलों में समस्त देवताओं का निवास है । 

                                                        वैज्ञानिक दृष्टिकोण 

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि संसार में केवल पीपल का ही पेड़ ऐसा है जो 24 घंटे दिन हो या रात ऑक्सीजन छोड़ता रहता है , जो प्राणधारियों के लिए प्राणवायु कही जाती है । प्रत्येक प्राणी ऑक्सीजन ग्रहण करता है और कार्बन - डाइ - ऑक्साइड छोड़ता है । इस गुण के अतिरिक्त इसकी छाया जाड़ों में गर्मी देती है और ग्रीष्मऋतु में शीतलता प्रदान करती है । पीपल के पत्तों का स्पर्श होने पर वायु में मिले संक्रामक वायरस नष्ट हो जाते हैं । आयुर्वेद के अनुसार इसकी छाल , पत्तों और फल आदि से अनेक प्रकार की रोग नाशक दवाइयाँ बनाई जाती हैं । इस प्रकार पीपल का वृक्ष वैज्ञानिक दृष्टि से पूजनीय है ।

                       स्त्रियाँ अपनी मांग में सिन्दूर क्यों लगाती हैं ?

माँग ( सीमन्त ) में सिन्दूर भरना सुहागिन स्त्रियों का सूचक है । हिन्दुओं में केवल विवाहित स्त्रियाँ ही सिन्दूर लगाती हैं । कुंवारी कन्याओं एवम् विधवा स्त्रियों के लिए सिन्दूर लगाना वर्जित है माँग में सिन्दूर भरने से चेहरे पर सुन्दरता झलकने लगती है अर्थात स्त्रियों के सौन्दर्य में निखार आ जाता है । विवाह - संस्कार के समय पर दूल्हा अपनी पत्नी की माँग में सिन्दूर भरता है । तब से वह स्त्री प्रतिदिन अपनी माँग में सिन्दूर भरती है । इसका अर्थ होता है पति की लम्बी आयु की कामना करना । माँग में दमकता सिन्दूर स्त्रियों के श्रृंगार का प्रमुख अंग है ।

                                                     वैज्ञानिक दृष्टिकोण

 माँग में सिन्दूर जहाँ विवाहित स्त्री होने का सूचक है , है इसका एक वैज्ञानिक कारण भी है । पुरुषों की अपेक्षा स्त्रिय का माँग काढ़ने वाला भाग अधिक कोमल होता है । सिन्दूर में पारा जैसी धातु अत्यधिक मात्रा में पायी जाती है जो स्त्रियों के शरीर की विद्युतीय ऊर्जा को नियंत्रित करती है । सिन्दुर मर्मस्थल को बाहरी दुष्प्रभावों से भी बचाता है । इससे ज्ञात होता है कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी स्त्रियों को सिन्दूर लगाना लाभप्रद है । 

                                       लोग मस्तक पर तिलक क्यों लगाते हैं ?

 तिलक , त्रिपुण्ड , टीका अथवा बिन्दिया आदि का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से होता है । मनुष्य की दोनों भौहों के बीच आज्ञा चक्र होता है । इस चक्र पर ध्यान केन्द्रित करने पर साधक का मन पूर्ण शक्ति सम्पन्न हो जाता है । इसे हम चेतना केन्द्र भी कह सकते हैं । समस्त ज्ञान एवम् चेतना का संचालन इसी स्थान से होता है । आज्ञा चक्र ही तृतीय नेत्र है । इस स्थान को दिव्य नेत्र भी कहा जा सकता है । तिलक लगाने से आज्ञा चक्र जागृत होता है , जिसकी तुलना राडार , टेलिस्कोप आदि से की जा सकती है । इसके अतिरिक्त तिलक सम्मान- सूचक भी है । तिलक लगाने से धार्मिकता का आभास होता है । 

                                                           वैज्ञानिक कारण 

 हम अपने मस्तिष्क से आवश्यकता से अधिक काम लेते हैं । इसका परिणाम यह होता है कि ज्ञान तन्तुओं का रक केन्द्र भृकुटि और ललाट के मध्य भाग में वेदना होने लगती है । चन्दन ज्ञान तन्तुओं को शीतलता प्रदान करता है । इसलिए प्रतिदिन चन्दन का तिलक लगाते हैं । जो प्राणी प्रतिदिन प्रात : काल स्नान के पश्चात् चन्दन का लेप माथे पर करता है उसे सिर दर्द की शिकायत नहीं होती । उपरोक्त वैज्ञानिक तथ्य को डाक्टर , हकीम और वैद्य सभी स्वीकार करते हैं । 

                                           गंगाजल पवित्र क्यों माना जाता है ? 

सब नदियों में गंगा नदी ही एक ऐसी नदी है जिसका जल घरों में रखने से कभी खराब नहीं होता ।  भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए ब्रह्मा जी की तपस्या की। ब्रह्मा जी मान गए और गंगा को आदेश दिया कि वह पृथ्वी पर जाये और वहां से पाताललोक जाये ताकि भगीरथ के वंशजों को मोक्ष प्राप्त हो सके। गंगा को यह काफी अपमानजनक लगा और उसने तय किया कि वह पूरे वेग के साथ स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरेगी और उसे बहा ले जायेगी। तब भगीरथ ने घबराकर शिवजी से प्रार्थना की कि वे गंगा के वेग को कम कर दें।

गंगा पूरे अहंकार के साथ शिव के सिर पर गिरने लगी। लेकिन शिव जी ने शांति पूर्वक उसे अपनी जटाओं में बांध लिया और केवल उसकी छोटी-छोटी धाराओं को ही बाहर निकलने दिया। शिव जी का स्पर्श प्राप्त करने से गंगा और अधिक पवित्र हो गयी। पाताललोक की तरफ़ जाती हुई गंगा ने पृथ्वी पर बहने के लिए एक अन्य धारा का निर्माण किया ताकि अभागे लोगों का उद्धार किया जा सके। गंगा एकमात्र ऐसी नदी है जो तीनों लोकों में बहती है-स्वर्ग, पृथ्वी, तथा पाताल। इसलिए संस्कृत भाषा में उसे "त्रिपथगा" (तीनों लोकों में बहने वाली) कहा जाता है।

                                   वैज्ञानिक कारण

गंगा के पानी में गंधक की प्रचुर मात्रा में है, इसलिए यह खराब नहीं होता है। इसके अतिरिक्त कुछ भू-रासायनिक क्रियाएं भी गंगाजल में होती रहती हैं. जिससे इसमें कभी कीड़े पैदा नहीं होते। यही कारण है कि गंगा के पानी को बेहद पवित्र माना जाता है।

                                           गाय का दूध पवित्र क्यों माना जाता है ?

 हमारे धर्म शास्त्रों में गाय के दूध को पवित्र माना गया है । गाय का दूध सेवन करने से संग्रहणी शोथ आदि रोग नष्ट हो जाते हैं । इसके सेवन से मोटापा कम हो जाता और यह मेदा की वृद्धि को भी दूर करता है । गाय के दूध है में प्रोटीन एवम् विटामिन उचित मात्रा में पाया जाते हैं जो छोटे बच्चों के लिए अति आवश्यक हैं । माँ के दूध के बाद डॉक्टर बच्चों को गाय का दूध ही बताते हैं । पौष्टिक एवं सतोगुण प्रधान गाय का दूध देवताओं को अर्पित किया जाता है । 

                                 वैज्ञानिक कारण

गाय का दूध सेहत के लिहाज से बेहद स्वास्थ्यवर्द्धक होता है। इसमें कैल्शियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है जो हड्डियों को मजबूत बनाने में सहायता करता है। गाय का दूध प्रोटीन का भी बेहतरीन स्रोत होता है। इसके अलावा इसमें विटमिन बी 2 और विटमिन बी 12 भी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।


                               लोग मूर्ति पूजा क्यों करते हैं ? 

मनुष्य का चंचल मन बड़ा चलायमान होता है । वह इधर उधर भटकता रहता है । मनुष्य चाहकर भी अपने चंचल मन की चंचलता को रोक नहीं पाते हैं । मन की चंचलता को स्थिर करने का एक मात्र साधन मूर्ति पूजा ही है । मूर्ति पर दृष्टि रखने से उस मूर्ति के प्रति भावना जागृत होती है और यह भावना ही मन की चंचलता को केन्द्रित करती है । मूर्ति पूजा का प्रचलन हिन्दुओं में ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों में भी है । जैसे सिक्ख धर्म के लोग गुरु ग्रन्थ साहब की पूजा करते हैं , ईसाई लोग पवित्र क्रॉस की पूजा करते हैं , मुसलमान कुरातशरीफ को मान्यता देते हैं । एकलव्य ने द्रोणाचार्य को गुरु मानकर उनकी प्रतिमा स्थापित करके बाण - विद्या में निपुणता ग्रहण की थी । भावना को उभारने हेतु मूर्ति आवश्यक है ।


                           लोग व्रत , उपवास क्यों रखते हैं ? 

धार्मिक व्यक्ति अपने देवी - देवताओं को प्रसन्न करने के लिए व्रत , उपवास रखते हैं । धार्मिक लोगों का विश्वास है कि देवी - देवता प्रसन्न होने पर मनोवांछित फल प्रदान करते हैं । वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उपवास रखने से शरीर सौष्टव बनता है । अन्न की मादकता कम होती है । भोजन के बाद आलस्य आता है । कभी - कभी पेट में गैस बन जाती है तो कभी खट्टी डकार आने लगती हैं । इन चीजों से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य हफ्ते में एक बार व्रत रखते हैं । मोटापा कम करने के लिए भी मनुष्य उपवास रखते हैं । 


                                    लोग माला क्यों फेरते हैं ? 

माला एक पवित्र वस्तु है । यह शुद्ध तथा पवित्र वस्तुओं द्वारा बनाई जाती है । इसमें 108 मनके होते हैं । ये 108 मनके साधक को जप संख्या की गणना करने में सहायक होते हैं । इन 108 मनको का भी एक रहस्य है । भारतीय मुनियों ने एक वर्ष में 27 नक्षत्र बतलाये हैं । प्रत्येक नक्षत्र के 4 चरण होते हैं । इस प्रकार 27x4 = 108 हुए । यह संख्या पवित्र ही नहीं अत्यन्त पवित्र मानी गई है । जप करते समय साधक को होंठ एवं जीभ को हिलाना पड़ता है । इससे कण्ठ की ध्वनियाँ प्रभावित होती हैं , जिसके कारण साधक को कण्ठमाला , गलगण्ड आदि रोग होने की संभावना बनी रहती है । इस प्रकार के रोगों से बचने के लिए औषधि युक्त काष्ट , तुलसी , रुद्राक्ष आदि की माला गले में धारण करनी चाहिए । 

                    विभिन्न मालाओं के धारण करने के लाभ : 

1. कमल गट्टे की माला : शत्रु विनाश हेतु । 

2. सर्प की हड्डी की माला : मारण एवं तामसी कार्यों के लिए ।

3. तुलसी की माला : भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए । 

4. जीव पुत्र की माला : संतान गोपाल का जप करने के लिए । 

5. कुश - ग्रन्थि की माला : पाप नाश करने के लिए । 

6. हरिद्रा की माला : विघ्न हरण के लिए । 

7. व्याघ्र नख की माला : नजर एवं टोने - टोटके से बचाव के लिए । 

8. रुद्राक्ष की माला : दीर्घायु होने के लिए जब महामृत्युंजय का जाप करना हो ।

 माला फेरने से लाभ - माला फेरते समय अँगूठे और अँगूली के मध्य घर्षण से एक प्रकार की विद्युत उत्पन्न होती है जो धमनियों द्वारा होकर सीधी हदय चक्र को प्रभावित करती है जिससे चंचल मन स्थिर हो जाता है ।

 एक्यू प्रेशर द्वारा इलाज एक ऐसी विद्या है जो शरीर की विभिन्न नसों से इलाज करने की पद्धति है । विद्वानों ने मनुष्य की नसों का विधिवत अध्ययन करने के उपरान्त इस विद्या का नाम एक्यूप्रेशर रखा । दोनों हाथों की हथेलियों के विभिन्न भागों को दबा - दबाकर शरीर के अन्य भागों का इलाज इस विद्या के अन्तर्गत किया जाता है । मध्यमा अंगुली की नस का सीधा सम्बन्ध हृदय से होता है । इसलिए माला जपते समय अँगूठे के साथ मध्यमा अंगुली का प्रयोग करते हैं ।


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