अंतःस्रावी ग्रंथि ( endocrine gland  )


जन्तुओं में विभिन्न शारीरिक क्रियाओं का नियंत्रण एवं समन्वयन तंत्रिका , तंत्र के अतिरिक्त कुछ विशिष्ट रासायनिक यौगिकों के द्वारा भी होता है । ये रासायनिक यौगिक हार्मोन ( Hormone ) कहलाते हैं । हार्मोन शब्द ग्रीक भाषा ( Gr : Hornaein = to stimulateorexcite ) से लिया गया है . जिसका अर्थ है - त्तेजित करने वाला पदार्थ । हार्मोन का स्राव शरीर की कुछ विशेष प्रकार की ग्रन्थियों द्वारा होता है , जिन्हें अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ ( Endocrine glands ) कहते हैं । अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों को नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ ( Duckless glands ) के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इनमें स्राव के लिए नलिकाएँ ( Ducts ) नहीं होती हैं । नलिकाविहीन होने के कारण ये ग्रन्थियाँ अपने स्रा हार्मोन्स को सीधे रुधिर परिसंचरण में मुक्त करती है । रुधिर परिसंचरण तंत्र द्वारा ही इनका परिवहन सम्पूर्ण शरीर में होता है ।

 ग्रन्थियों के प्रकार ! कशेरुकी जन्तुओं में तीन प्रकार की ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं । ये हैं-

 ( a ) वहिःस्रावी ग्रन्थियाँ ( Exocrine glands ) : शरीर की ऐसी ग्रन्थियाँ जिनके द्वारा स्रावित स्राव को विभिन्न अंगों तक पहुँचाने के लिए वाहिनियाँ या नलिकाएँ होती हैं , बहिःस्रावी ग्रन्थियाँ ( Exocrine Glands ) कहलाती है । बहिःस्रावी ग्रन्थियों को नलिकायुक्त ग्रन्थियाँ ( Duct glands ) भी कहते हैं । बहिःस्रावी ग्रन्थियों के स्त्राव को एन्जाइम ( Enzyme ) कहा जाता है । स्वेद ग्रन्थि ( sweat gland) , दुग्ध ग्रन्थि , लार ग्रन्थि , श्लेष्ण ग्रन्थि ( mucous gland ) , अश्रु ग्रन्थि आदि बहिःस्रावी ग्रन्थि के प्रमुख उदाहरण हैं । 

( b ) अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ ( Endocrine Glands ) : बहिःस्रावी ग्रन्थियों के विपरीत अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ नलिकाविहीन ( Ductless ) होती हैं । अतः इन्हें नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ ( Ductless glands ) भी कहते हैं । अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ नलिका ( Duct ) के अभाव में अपने स्राव को सीधे रुधिर परिसंचरण में मुक्त करती हैं । अन्तःस्रावी ग्रन्थियों द्वारा स्रावित स्राव को अन्तःत्राव या हार्मोन ( Hormone ) कहते हैं । ये हार्मोन फिर रुधिर के साथ उन अंगों तक चले जाते हैं , जहाँ इनका प्रभाव होना होता हैं । पीयूष ग्रन्थि , थाइरॉयड ग्रन्थि , अधिवृक्क ग्रन्थि , पैराथाइरॉयड ग्रन्थि पीनियल काय , थाइमस ग्रन्थि आदि प्रमुख अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ हैं ।

( c ) मिश्रित प्रन्थियाँ ( Mixed glands ) : कुछ ग्रन्थियाँ ऐसी होती हैं जो बहिःस्रावी तथा अन्तःस्रावी दोनों ही प्रकार की होती हैं , उन्हें मिश्रित ग्रन्थियों कहते हैं । जैसे — अग्न्याशय ( Pancreas ) । 

मानव शरीर की मुख्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ एवं उनसे स्रावित हार्मोन के कार्य एवं प्रभाव :
 A. पीयूष ग्रन्थि ( Pituitary gland ) ; यह कपाल ( Skull ) की स्फेनॉयड ( Sphenoid ) हड्डी में सेलाटर्सिका ( Sellaturcica ) नामक गड्ढे में उपस्थित रहती है । यह तालु ( Falate ) एवं मस्तिष्क ( Brain ) के अधरतल के मध्य स्थित रहती है एवं उससे एक इन्फन्डीबुलम ( Infundibulum ) नाम छोटे वृन्त ( Stalk ) से जुड़ी रहती है । इसका भार लगभग 0.6 ग्राम होता है । स्त्रियों में गर्भावस्था के दौरान यह कुछ बड़ी हो जाती है । पीयूष ग्रन्थि को मास्टर ग्रन्थि ( Master Glands ) भी कहा जाता है , क्योंकि यह अन्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के श्रवण को नियंत्रित करती है । साथ - ही - साथ यह व्यक्ति के स्वभाव , स्वास्थ्य , वृद्धि एवं लैंगिक विकास को भी प्रेरित करती है ।


 पीयूष ग्रन्थि से स्रावित होने वाले हार्मोन एवं उनके कार्य : पीयूष ग्रन्थि द्वारा निम्नलिखित हार्मोनों का स्राव होता है 

1. वृद्धि हार्मोन या सोमैटोट्रॉपिक हार्मोन ( Growth hromone or somatotropic hormone ) : यह शरीर की वृद्धि विशेषतया हड्डियों की वृद्धि का नियंत्रण करता है । इसकी अधिकता से भीमकायता ( Gigantism ) अथवा एक्रोमिगेली ( Acromegaly ) विकार उत्पन्न हो जाता है । इसके कारण मनुष्य की लम्बाई सामान्य से बहुत अधिक बढ़ जाती है तथा हड्डियाँ भारी व मोटी हो जाती हैं | बाल्यावस्था में इस हार्मोन के कम स्राव से शरीर की वृद्धि रुक जाती है जिससे मनुष्य में बौनापन ( Dwarfism ) हो जाता है । 

2. थायरोट्रोपिक या थाइरॉइड प्रेरक हार्मोन ( Thyrotropic or thyroid stimulating hormone - STH ) : यह हार्मोन थाइरायड ग्रन्थि के कार्यों को उद्दीपित करता है । यह थाइरॉक्सिन ( Thyroxine ) हार्मोन के स्रवण को भी प्रभावित करता है । 

3. एड्रिनोकॉर्टिको ट्रापिक हार्मोन ( Adrenocortico tropic hormone - ACTH ) : यह हार्मोन अधिवृक्क ग्रन्थि ( Adrenal gland ) के कार्टेक्स ( Cortex ) को प्रभावित कर उससे निकलने वाले हार्मोन को भी प्रेरित करता है ।

4. गोनेडोट्रॉपिक हार्मोन ( Gonadotropic hormone ) : यह हार्मोन जनन ग्रन्थियों ( Gonads ) की क्रियाशीलता को प्रभावित करता है । यह दो प्रकार का होता है । 

( a ) फॉलिकिल उत्तेजन हार्मोन ( Follicle stimulating hormone - FSH ) : पुरुषों में यह हार्मोन शुक्रजन ( Spermatogenesis ) को उद्दीपित करता है । स्त्रियों में यह हार्मोन अण्डाशय से अण्डोत्सर्ग ( Ovulation ) को प्रेरित करता है । यह अण्डाशय में फॉलिकिल की वृद्धि में सहायता करता है ।

 ( b ) ल्यूटीनाइजिंग हार्मोन ( Lutenizing hormone - LH ) : पुरुषों में यह हार्मोन अन्तराली कोशिकाओं ( Interstial cells ) को प्रभावित कर नर हार्मोन टेस्टोस्टेरॉन ( Testosterone ) को प्रेरित करता है , जबकि स्त्रियों में यह एस्ट्रोजन हार्मोन के स्राव को प्रेरित करता है ।

5. दुग्धजनक हामोन ( Lactogenic hormone - LTH ) : यह दुग्धजनक हार्मोन है । इस हार्मोन का मुख्य कार्य शिशु के लिए स्तनों में दुग्ध स्राव उत्पन्न करना है । इस हार्मोन से कार्पसल्यूटियम ( Corpus luteum ) का  स्राव भी शुरू होता है ।

 6. मिलैनोसाइट प्रेरक हार्मोन ( Melanocyte stimulating hormone ) : निम्न जन्तुओं एवं पक्षियों में यह हार्मोन मिलेनिन ( Melanin ) वर्णक के कणों को फैलाकर त्वचा के रंग को प्रभावित करता है । इसके फलस्वरूप त्वचा रंगीन होती है । मनुष्य में यह हार्मोन त्वचा पर चकते तथा तिल पड़ने को प्रेरित करता है ।

7. वेसोप्रेसिन या एन्टीडाइयूरेटिक हार्मोन ( Vasopressin or Antidiuratichormone - ADH ) : यह हार्मोन वृक्क की मूत्रवाहिनियों को जल पुनरावशोषण ( Reabsorption ) करने के लिए प्रेरित करता है । इसके अतिरिक्त यह रुधिर वाहिनियों को सिकोड़ कर रुधिर दाब ( Blood pressure ) बढ़ाता है । यह शरीर के जल संतुलन में सहायक होता है । इस कारण इसे एन्टीडाइयूरेटिक ( Antidiuratic ) कहा जाता है । इस हार्मोन की कमी से उदकमेह या डायबिटीज इन्सिपिड्स नामक रोग हो जाता है । 

8. ऑक्सीटोसीन ( Oxytocin ) या पाइटोसिन ( Pitocin ) : यह हार्मोन गर्भाशय की अरेखित पेशियों में सिकुड़न पैदा करता है जिससे प्रसव पीड़ा ( Labour pain ) उत्पन्न होती है और बच्चे के जन्म में सहायता पहुँचाता है । यह स्तन से दुग्ध स्राव में भी सहायक होता है । 

B. अवटु ग्रन्थि ( Thyroid gland ) ; मनुष्य में यह ग्रन्थि द्विपिण्डक रचना होती है । यह ग्रन्थि श्वास नली या ट्रैकिया ( Trachea ) के दोनों तरफ लैरिक्स ( Larynx ) के नीचे स्थित रहती है । यह संयोजी ऊतक की पतली अनुप्रस्थ पट्टी से जुड़ी रहती है , जिसे इस्थमस ( Isthmus ) कहते हैं । यह अनेक खोखली व गोल पुटिकाओं ( Follicles ) से मिलकर बनता है । इन पुटिकाओं की गुहा में आयोडीन युक्त गुलाबी रंग का कोलायडी पदार्थ स्रावित होता है , जिसे थाइरोग्लोब्यूलिन ( Thyroglobulin ) कहते हैं । थाइरॉइड ग्रन्थि का अन्तःस्राव या हार्मोन थाइरॉक्सिन ( Thyroxine ) तथा ट्रायोडोथाइरोनिन ( Triodothyronine ) है । इन दोनों ही हार्मोनों में आयोडीन ( Iodine ) अधिक मात्रा में रहता है ।

अवटु ग्रन्थि से स्रावित हार्मोन एवं उनके कार्य 

1. थाइरॉक्सिन ( Thyroxine ) : यह हामोन कोशिकीय श्वसन की गति को तीव्र करता है । यह शरीर की सामान्य वृद्धि विशेषतया हड्डियों , बाल इत्यादि के विकास के लिए अनिवार्य है । यह हार्मोन दूसरी अन्तःस्रावी ग्रन्थियों को भी प्रभावित करता है । यह पीयूष ग्रन्थि द्वारा स्रावित हार्मोन के साथ सहयोग कर शरीर में जल संतुलन का नियंत्रण करता है । बच्चों में थाइरॉक्सिन की कमी के कारण अवटुवामनता ( Cretinism ) नामक रोग उत्पन्न हो जाता है । इस रोग में 30 वर्ष की उम्र वाला वयस्क 4 अथवा 5 वर्ष का बालक प्रतीत होता है । यौवनावस्था ( Puberty ) के पश्चात इस हार्मोन की कमी के कारण शरीर में मिक्सिडिमा ( Myxioedema ) नामक रोग उत्पन्न होता है । मनुष्य में एक लम्बे समय तक इस हार्मोन की कमी के कारण हाइपोथाइरॉयडिज्म ( Hypothyroidisrn ) रोग उत्पन्न हो जाता है । भोजन में आयोडीन की कमी के कारण घेघा या ग्वाइटर ( Goitre ) नामक रोग हो जाता है । इसके कारण थाइराइड ग्रन्थि के आकार में बहुत वृद्धि हो जाती है । थायरॉक्सिन के आधिक्य से टॉक्सिक ग्वाइटर ( Toxic goitre ) नामक रोग होता है । थाक्रॉक्सिन की अधिकता के कारण आँख फूलकर नेत्रकोटर से बाहर निकल जाती है । इस रोग को एक्सोप्थेलमिक ग्वाइटर ( Exophthalmic goitre ) कहते हैं । 

C. परावटु ग्रन्थि ( Parathyroid glands ) : ये मटर की आकृति की पालियुक्त ( Lobed ) ग्रन्थियाँ हैं । ये थाइरॉइड ग्रन्थि के पीछे स्थित रहती है और संयोजी ऊतक के एक संपुट द्वारा उससे अलग रहती है | परावटु ग्रन्थि द्वारा वावित हार्मोन व उनके कार्य : इस ग्रन्थि द्वारा दो हार्मोनों का स्राव होता है । ये दोनों रक्त में कैल्सियम और फॉस्फोरस की मात्रा का नियंत्रण करते हैं । ये हार्मोन हैं 1. पैराथाइरॉइड हार्मोन ( Parathyroid hormone ) ; यह हार्मोन उस समय मुक्त होता है , जब रक्त में कैल्सियम की कमी हो जाती है । यह हार्मोन कैल्सियम के अवशोषण तथा वृक्क में इसके पुनरावशोषण ( Reabsorption ) को बढ़ाता है । यह अस्थियों के अनावश्यक भाग को गलाकर रक्त में कैल्सियम और फॉस्फोरस मुक्त करता है । यह हड्डियों की वृद्धि एवं दाँतों के निर्माण का नियंत्रण करता है | 2. कैल्सिटोनिन हार्मोन ( Calcitonin hormone ) : जब रक्त में कैल्सियम की मात्रा अधिक हो जाती है , तब यह हार्मोन मुक्त होता है । यह हार्मोन पैराथाइरॉइड हार्मोन के विपरीत काम करता है । यह हड्डियों के विघटन को कम करता है तथा मूत्र में कैल्सियम का उत्सर्जन बढ़ाता है ।


 D. अधिवृक्क ग्रन्धि ( Adrenal gland ) : अधिवृक्क ग्रन्थि को उपरिवृक्कीय ग्रन्थि या सुप्रारीनल ग्लैंड के नाम से भी जाना जाता है । यह ग्रन्थि प्रत्येक वृक्क के ऊपरी सिरे पर अंदर की ओर स्थित रहती है । वस्तुतः अधिवृक्क ग्रन्थि के दो भाग होते हैं 

1. बाहरी वल्कुट या कॉर्टेक्स ( Cortex )

 2. अंदरुनी मध्यांश या मेडुला ( Medulla )

 ये दोनों भाग कार्यात्मक रूप से तथा उत्पत्ति में भी एक दूसरे से भिन्न होते हैं । 

1. एड्रीनल कॉर्टेक्स द्वारा स्रावित हार्मोन एवं उनके कार्य : इसके द्वारा स्रावित हार्मोनों को निम्नलिखित तीन समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है । 

( a ) ग्लूकोकॉर्टिक्वायर्ड्स ( Glucocorticoids ) : भोजन उपापचय में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है । ये कार्बोहाइड्रेट , प्रोटीन एवं वसा के उपापचय का नियंत्रण करते हैं । शरीर में जल एवं इलेक्ट्रोलाइट्स के नियंत्रण भी ये सहायक होते हैं । ये अमाशयिक स्राव को प्रेरित करते हैं । ये हार्मोन प्रदाह - विरोधी ( Anti inflammatory ) होते हैं , जिसके लिए ये श्वेत रुधिराणुओं पर नियंत्रण कर उत्तेजक पदार्थों के प्रति सुरक्षा प्रतिक्रियाओं को रोकते हैं । ये शरीर में लाल रुधिराणुओं की संख्या को बढ़ाते हैं तथा श्वेत रुधिराणुओं को नियंत्रित करते हैं । 

( b ) मिनरलोकॉर्टिक्वायड्स ( Mineralocorticoids ) : इनका मुख्य कार्य वृक्क नलिकाओं द्वारा लवण के पुनः अवशोषण एवं शरीर में अन्य लवणों की मात्रा का नियंत्रण करना है । ये शरीर में जल संतुलन को भी नियंत्रित करते हैं । इसके प्रभाव से मूत्र द्वारा पोटैशियम और फॉस्फेट का अधिक मात्रा में उत्सर्जन और सोडियम क्लोराइड एवं जल का कम मात्रा में उत्सर्जन होता है ।

( c ) लिंग हार्मोन ( Sex hormones ) : ये हार्मोन पेशियों तथा हड्डियों के परिवर्धन , बाह्यलिंगों , बालों के आने का प्रतिमान एवं यौन आचरण का नियंत्रण करते हैं । ये हार्मोन मुख्यतः नर हानि एन्ड्रोजन्स ( Androgens ) तथा मादा हार्मोन एस्ट्रोजन्स ( Estrogens ) होते हैं । नर हार्मोन में मुख्य डीहाइड्रोएपीएन्ड्रोस्टीरोन ( Dehydroepiandrosterone )  होता है । स्त्रियों में इस हार्मोन की अधिकता से चेहरे पर बाल बढ़ने लगते हैं । इस प्रक्रिया को एड्रीनल विरिलिज्म ( Adrenal virilism ) कहते हैं ।

2. एड्रीनल मेडुला द्वारा स्रावित हार्मोन व उनके कार्य : एड्रीनल मेडुला से निम्नलिखित दो हार्मोनों का स्राव होता है- 

( a ) एड्रीनेलीन ( Adrenalin ) : इस हार्मोन को एड्रीनिन ( Adrenin ) एवं एपिनेफ्रीन ( Epineprin ) भी कहते हैं । यह हार्मोन मेडुला से भ्रावित हार्मोन का अधिकांश भाग होता है । यह हार्मोन क्रोध , डर , मानसिक तनाव एवं व्यस्तता की अवस्था में अत्यधिक त्रावित होने लगता है , जिससे इन संकटकालीन परिस्थितियों में उचित कदम उठाने का निर्णय लिया जा सकता है । यह हृदय स्पंदन की दर को बढ़ाता है । यह हार्मोन रोंगटे खड़े होने के लिए प्रेरित करता है । यह आँख की पुतलियों को फैलाता है । अधिवृक्क ग्रन्थि से निकलने वाले इस हार्मोन को लड़ो और उड़ो हार्मोन कहा जाता है । 

( b ) नॉर एड्रीनेलीन या नॉरएपीनेफ्रीन ( Nor adrenalin or Nor epinephrine ) : ये समान रूप से हृदय पेशियों की उत्तेजनशीलता एवं संकुचनशीलता को तेज करते हैं । परिणामस्वरूप रक्त चाप ( Blood pressure ) बढ़ जाता है । यह हृदय स्पंदन के एकाएक रुक जाने पर उसे पुनः चालू करने में सहायक होता है ।

 एड्रीनल के अल्पस्रवण से होने वाले रोग : 

1. एडीसन रोग ( Addison's disease ) : इस रोग में रुधिर दाब कम हो जाता है तथा सोडियम एवं जल का उत्सर्जन बढ़ जाता है जिससे निर्जलीकरण ( Dehydration ) हो जाता है । चेहरे , गर्दन एवं त्वचा पर जगह - जगह चकते पड़ जाते हैं । 

2. कॉन्स रोग ( Conn's disease ) : यह रोग सोडियम एवं पोटैशियम की कमी से हो जाता है । इस रोग में पेशियों में अकड़न आ जाती है एवं रोगी की मृत्यु भी हो जाती है ।

एड्रीनल के अतिस्रवण से होने वाले रोग : 

1. कुशिंग रोग ( Cushing disease ) : इस रोग में शरीर में जल एवं सोडियम का जमाव अधिक हा जाता है । पेशीय शिथिलन होने लगता है । प्रोटीन केटाबलिज्म ( Protein catabolism ) बढ़ जाता है तथा हड्डियाँ अनियमित हो जाती हैं । 

2 , एड्रीनल विरिलिज्म ( Adrenal virilism ) : इस रोग में स्त्रियों में पुरुषों के लक्षण बनने लगते हैं । इसमें स्त्रियों के चेहरे पर दाढ़ी व मूंछों का आना , आवाज मोटी हो जाना , बाँझपन उत्पन्न हो जाना इत्यादि होते हैं । 

E. थाइमस ग्रन्थि ( Thymus gland ) : यह ग्रंथि वक्ष में हृदय से आगे स्थित होती है । यह ग्रंथि वृद्धावस्था में लुप्त हो जाती है । यह गुलाबी , चपटी एवं द्विपालित ( Bilobed ) ग्रन्थि है ।

 थाइमस ग्रन्थि से सावित हार्मोन व उनके कार्य : थाइमस ग्रन्थि से निम्नलिखित हार्मोनों का स्राव होता है -1 . थाइमोसीन ( Thymasin ) , 2. थाइमीन- I ( Thymin - I ) , 3. थाइमीन- II ( Thymin - II ) ।

ये हार्मोन शरीर में लिम्फोसाइट कोशिकाएँ बनाने में सहायक होती हैं । ये हार्मोन लिम्फोसाइट को जीवाणुओं एवं एन्टीजन्स ( Antigens ) को नष्ट करने के लिए प्रेरित करती हैं । ये शरीर में एन्टीबॉडी बनाकर शरीर की सुरक्षा तंत्र स्थापित करने में सहायक होती हैं । 

( F ) अग्न्याशय की लैंगरहेस की द्वीपिकाएँ : अग्न्याशय एक हल्के पीले रंग की विसरित ग्रंथि है । यह आमाशय एवं डयूओडिनम ( Duodenum ) के बीच स्थित होती है । इससे अग्न्याशय रस स्रावित होता है । इस रस में कई पाचक एन्जाइम होते हैं । इस प्रकार यह एक बहिःस्रावी ग्रन्थि है , परन्तु अग्न्याशय में विशिष्ट प्रकार की कोशिकाओं के समूह पाये जाते हैं , जिन्हें लैंगरर्हस की द्वीपिकाएँ ( Islets of Langerhans ) कहते हैं । ये अन्तःस्रावी ग्रन्थि का काम करती है ।

लैगरहँस की द्वीपिका द्वारा स्रावित हार्मोन एवं उनके कार्य : लैंगरहँस की दीपिका में निम्नलिखित तीन प्रकार की कोशिकाएँ पायी जाती हैं

( a ) α – कोशिकाएँ (α-cells)

( b )  β- कोशिकाएँ (B-cells)

( c ) δ- कोशिकाएँ (δ—cells) γ- कोशिकाएँ (Gamma cells)

इससे निम्नलिखित हार्मोनों का स्राव होता है 

( a ) ग्लूकागॉन ( Glucagon ) : यह हार्मोन अल्फा कोशिकाओं ( α - cells ) द्वारा स्रावित होता है । यह यकृत ( Liver ) में ग्लूकोनियोजेनेसिस ( Gluconeogenesis ) को प्रेरित करता है , जिससे ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है । यह ऊतकों में ग्लूकोज के उत्पादन में भी सहायक होता है ।

( b ) इन्सुलिन ( Insulin ) : यह हार्मोन  β- कोशिकाओं (  β - Cells ) द्वारा स्रावित होता है । यह कार्बोहाइड्रेट उपापचय के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है । यह पेशियों एवं यकृत में ग्लूकोस से ग्लाइकोजेन के परिवर्तन की दर को काफी बढ़ा देता है । यह शर्करा एवं वसा के निर्माण में भी सहायक है और प्रोटीन संश्लेषण को प्रेरित करता है । यह पेशियों में ग्लूकोस उपापचय को तीव्र करता है । अगर अग्न्याशय इन्सुलिन हार्मोन का उत्पादन बन्द कर दे तो मूत्र एवं रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ जाएगी । यह ग्लूकोस के ऑक्सीकरण से शरीर कोशिकाओं में ऊर्जा विमुक्ति को प्रभावित करता है । 

इन्सुलिन के अल्पस्रवण से मधुमेह या डाइबिटीज मेलिटस ( Diabetes mellitus ) नामक रोग होता है । इस रोग में रुधिर में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने लगती है । ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने से ग्लूकोज मूत्र में उत्सर्जित होने लगता है । मूत्र में जल की मात्रा बढ़ जाती है जिससे मूत्र पतला एवं मात्रा बढ़ जाती है । इस प्रकार बहुमूत्रता की अवस्था उत्पन्न हो जाती है । 

इन्सुलिन के अतिस्रवण से हाइपोग्लाइसीमिया ( Hypoglycemia ) नामक रोग हो जाता है । इस रोग में रक्त में रुधिर की मात्रा कम हो जाती है जिससे तंत्रिका तथा रेटिना की कोशिकाएँ ऊर्जा की कम मात्रा की अवस्था में आ जाती है । इससे जनन क्षमता एवं दृष्टि ज्ञान कम होने लगता है तथा रोगी को थकावट अधिक महसूस होती है ।

( c ) सोमेटोस्टेटीन ( Sornatostatin ) : यह हार्मोन डेल्टा कोशिकाओं या गामा कोशिकाओं से स्रावित होता है । यह हार्मोन पॉलीपेप्टाइड होता है जो पचे हुए भोजन के स्वांगीकरण ( Assimilation ) की अवधि बढ़ाता है । 

G. जनन ग्रन्थियाँ ( Gonads ) : जनन ग्रन्थियाँ जनन कोशिकाओं के निर्माण के अलावा अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के रूप में भी कार्य करती है । 

1. अण्डाशय ( Ovary ) : यह मादा के उदर गुहा में स्थित होता है । इसके द्वारा निम्नलिखित हार्मोनों का वाव होता है

( a ) एस्ट्रोजन ( Estrogen ) : यह एस्टेरॉयड ( Steroid ) होता है , जो ग्रेफियन फॉलिकिल ( Graffian follicle ) द्वारा बावित होता है । यह हार्मोन यौवनावस्था में यौन लक्षणों जैसे — गर्भाशय ( Uterus ) , योनि ( Vagina ) , भगशिश्न ( Clitoris ) व स्तनों के विकास को प्रेरित करता है । यह हार्मोन गर्भाशयी एण्डोमीट्रियम ( Uterine endometrium ) की वृद्धि को प्रेरित करता है तथा अंडवाहिनी ( Oviduct ) के परिवर्द्धन को पूर्ण करता है । इस हार्मोन की कमी के कारण जनन क्षमता क्षीण हो जाती है , रजनोवृत्ति ( Menopause ) का आभास होने लगता है तथा स्तन ढलने लगता है ।

( b ) प्रोजेस्टेरॉन ( Progesteron ) : इस हार्मोन का स्राव प्रति पिण्ड या कॉर्पसल्यूटियम ( Corpus luteum ) की कोशिकाओं द्वारा होता है । यह एस्ट्रोजेन से सहयोग कर स्तन के विकास एवं दुग्ध ग्रन्थियों को सक्रिय करता है इसके अतिरिक्त यह गर्भावस्था एवं प्रसव में होने वाले परिवर्तनों से भी सम्बद्ध होता है । अतः यह हार्मोन ' गर्भधारण के निर्धारण वाला हार्मोन ' कहलाता है ।

( c ) रिलैक्सिन ( Relaxin ) : यह हार्मोन भी कॉर्पस ल्यूटियम ( Corpus luteum ) द्वारा स्रावित होता है । गर्भावस्था में यह अण्डाशय , गर्भाशय एवं अपरा ( Placenta ) में उपस्थित रहता है । यह हार्मोन प्यूविक सिम्फाइसिस ( Pubicsymphysis ) को मुलायम करता है तथा गर्भाशय को सिकुड़ने से रोकता है । यह गर्भाशय ग्रीवा ( Uterine cervix ) को चौड़ा करता है । इससे बच्चे के जन्म में सहायता मिलती है ।

2. वृषण ( Testes ) : यह नर जनन अंग है । यह शरीर के बाहर स्क्रोटल कोष ( Serotal sac ) में स्थित होते हैं । वृषण के अंदर स्थित अन्तराली कोशिकाओं ( Interstitial cells ) या लीडिंग कोशिकाओं ( Leyding cells ) से नर हार्मोन सावित होते हैं , जिन्हें एण्डोजेन ( Androgen ) कहते हैं । सबसे प्रमुख एन्ड्रोजेन हार्मोन को टेस्टोस्टेरॉन ( Testosteron ) कहते हैं | यह हार्मोन पुरुषोचित लैंगिक लक्षणों के परिवर्द्धन को एवं यौन - आचार को प्रेरित करता है । 

प्रजनन तंत्र

जिस प्रक्रम द्वारा जीव अपनी संख्या में वृद्धि करते हैं , उसे प्रजनन ( Reproduction ) कहते हैं । प्रजनन जीवों का सर्वप्रमुख लक्षण है । इस पृथ्वी पर जीव - जातियों की सततता प्रजनन के फलस्वरूप ही संभव हो पायी है । इस प्रकार प्रजनन वह प्रक्रम है जिसके द्वारा जीव अपनी ही जैसी अन्य उर्वर सन्तानों की उत्पत्ति करता है और इस प्रकार अपनी संख्या में वृद्धि कर अपनी जाति के अस्तित्व को बराबर बनाए रखकर उसे विलुप्त होने से बचाता है । जीवों के प्रजनन में भाग लेने वाले अंगों प्रजनन अंग ( Reproductive organs ) तथा एक जीव के सभी प्रजनन अंगों को सम्मिलित रूप से प्रजनन तंत्र ( Reproductive system ) कहते हैं ।

मानव प्रजनन तंत्र ( Human reproductive system ) : मानव एकलिंगी ( Unisexual ) प्राणी है , अर्थात् नर और मादा लिंग अलग अलग जीवों में पाये जाते हैं । जो जीव केवल शुक्राणु उत्पन्न करते हैं उसे नर कहते हैं । जिन जीवों से केवल अण्डाणु की उत्पत्ति होती है , उन्हें मादा कहते हैं । मानव में प्रजनन तंत्र अन्य जन्तुओं की अपेक्षा बहुत अधिक विकसित और जटिल होता है । मानव में अण्डे का निषेचन ( Fertilization ) फैलोपिअन नलिका ( Fallopian tube ) तथा भ्रूणीय विकास ( Embryonic development ) गर्भाशय ( Uterus ) में होता है । मानव जरायुज ( Viviparous ) होते हैं अर्थात् ये सीधे शिशु को जन्म देते हैं । मानव में जनन अंग मादा में 12 से 13 वर्ष की उम्र में तथा नर में 15 से 18 वर्ष की उम्र में प्रायः क्रियाशील हो जाते हैं । प्रजनन अंग भी कुछ हार्मोन ( Hormone ) का स्राव ( Secretion ) करते हैं जो शरीर में अनेक प्रकार के परिवर्तन लाते हैं । ऐसे परिवर्तन मादा में प्रायः वक्ष तथा जनन अंगों पर बाल उगने तथा नर में दाढ़ी एवं मूंछ आने से परिलक्षित होता है । मानव में नर तथा मादा प्रजनन अंग पूर्णतया अलग - अलग होते हैं ।

नरप्रजनन तंत्र ( Male reproductive system ) : जनन कोशिका उत्पादित करने वाले अंग एवं जनन कोशिकाओं को निषेचन के स्थान तक पहुँचाने वाले अंग संयुक्त रूप से नर प्रजनन तंत्र कहलाते हैं । मानव के नर प्रजनन तंत्र में निम्नलिखित लैंगिक अंग ( Sex organs ) एवं उनसे सम्बद्ध अन्य रचनाएँ पायी जाती हैं 

1. वृषण एवं वृषण कोष , 2. अधिवृषण , 3. शुक्रवाहिका , 4.शुक्राशय , 5. मूत्र मार्ग , 6. शिश्न , 7.पुरःस्थ या प्रोस्टेट 

1 वृषण एवं वृषण कोष ( Testes and scrotal sac ) : वृषण नर जनन ग्रन्थियाँ हैं जो अण्डाकार होती हैं । इनकी संख्या दो होती है । वृषण नर में पाया जाने वाला प्राथमिक जनन अंग है । वृषण त्वचा की बनी एक थैली जैसी रचना में स्थित रहते हैं जो शरीर के बाहर लटकती रहती है । इसे वृषण कोष ( Scrotal sac ) कहते हैं । वृषण की कोशिकाओं द्वारा नर युग्मक अर्थात् शुक्राणुओं का निर्माण होता है । शुक्राणु ( Sperm ) उत्पादन के लिए आवश्यक ताप शरीर के ताप से कम होता है । यही कारण है कि वृषण उदर गुहा के बाहर वृषण कोष में स्थित होते हैं । एक औसत स्खलन में लगभग एक चम्मच शुक्र स्राव होता है । इसमें शुक्राणुओं की संख्या 20 से 20 लाख तक होती है । शुक्राणु की लम्बाई 5 माइक्रॉन होती है । यह तीन भाग में विभाजित रहता है — सिर , ग्रीवा और पुच्छ । शुक्राणु शरीर में 30 दिन तक जीवित रहते है जबकि मैथून के पश्चात स्त्रियों में केवल 72 घण्टे तक ये जीवित रहते हैं । वृषण में एक प्रकार का द्रव भरा रहता है जिसे ' वृषण द्रव ' ( Seminal fluid ) कहते हैं । वृषण का प्रत्येक खण्ड शुक्रजनन नलिकाओं ( Seminiferous tubules ) से भरा रहता है । ये नलिकाएँ छल्लेदार होती है । शुक्रजनन नलिकाओं के बीच अंतराली कोशिकाओं ( Interstitial cells ) के समूह पाये जाते हैं जो नर जनन हार्मोन टेस्टोस्टेरॉन ( Testosterone ) का स्राव करती है । यह हार्मोन गौण लैंगिक लक्षणों ( Secondary sexual characters ) के विकास और नियंत्रण में सहायक होता है । सभी शुक्रजनन नलिकाएँ आपस में मिलकर शुक्र अपवाहिका ( Vas efferentia ) बनाती है । शुक्र अपवाहिकाएँ मिलकर अन्त में अधिवृषण - वाहिनी ( Epididymis duct ) बनाती है । वृषण में ही शुक्रजनन नलिकाओं द्वारा शुक्राणु कोशिकाओं की उत्पत्ति होती है । वृषण से शुक्राणु कोशिकाएँ अधिवृषण ( Epididyonis ) में चली जाती हैं जहाँ वे संचित रहती हैं । वृषण का प्रमुख कार्य शुक्राणुओं का निर्माण करना और नर हार्मोन टेस्टोस्टेरान की उत्पत्ति करना है । 

2. अधिवृषण ( Epididymis ) : यह एक 6 मीटर लम्बी कुण्डलित नलिका होती है जो प्रत्येक वृषण के पीछे स्थित होती है । यह वृषण से अच्छी तरह जुड़ी रहती है । इसका एक छोर वृषण से जुड़ा रहता है तथा दूसरा छोर अधिवृषण से आगे बढ़कर शुक्रवाहिका ( Vas deferens ) बनाता है । अधिवृषण शुक्राणुओं के प्रमुख संग्रह स्थान का कार्य करता है । इसके अतिरिक्त अधिवृषण में शुक्राणुओं का परिपक्वन ( Maturation ) भी होता है । शुक्राणु यहीं सक्रियता प्राप्त करते हैं । 

3. शुक्रवाहिका ( Vas deferens ) : यह एक पतली नलिका होती है जिसकी भित्तियाँ मांसपेशियों की बनी होती है । अधिवृषण से शुक्राणु शुक्रवाहिका में पहुँचते हैं । शुक्रवाहिका अधिवृषण को शुक्राशय ( Seminal vesicle ) से जोड़ती है । ये शुक्राणुओं को आगे की ओर बढ़ाने का काम करती हैं ।

4. शुक्राशय ( Vas vesicles ) : यह एक जोड़ी पतली पेशीयुक्त भित्तियोंवाली रचना होती हैं । ये पालियुक्त ( Lobed ) रचनाएँ होती हैं । यह प्रोस्टेट ग्रन्थियों ( Prostate glands ) के ऊपर स्थित रहता है । दोनों ओर के शुक्राशय मिलकर स्खलनीय वाहिनी ( Ejaculatory duct ) का निर्माण करते हैं । शुक्राशय से एक प्रकार का चिपचिपा पदार्थ स्रावित होता है ।

5. पुरःस्थ ( Prostate ) : यह मूत्र मार्ग ( Urethra ) से मूत्राशय ( Urinary bladder ) तक सम्बद्ध रहता है । इसका आकार गोल सुपारी जैसा होता है । दोनों पुरःस्थ ( Prostate ) ग्रन्थियों संयुक्त होकर एक सामान्य पुरःस्थ ग्रन्थि का निर्माण करती है । इसमें लगभग दो दर्जन नलिकाएँ होती हैं जो मूत्रमार्ग ( Urethra ) में खुलती है । पुरःस्थ से एक प्रकार का द्रव स्रावित होता है जिसे पुरःस्थ द्रव ( Prostate fluid ) कहते हैं । यह द्रव शुक्र ( Sement को विशिष्ट गंध ( Smell ) प्रदान करता है । पुरःस्थ द्रव शुक्राशय द्रव के साथ मिलकर मूत्रमार्ग ( Urethra ) में पहुँचते हैं ।

6. शिश्न ( Penis ) : शिश्न पुरुषों का संभोग करने वाला अंग होता है । शिश्न के माध्यम से ही शुक्राणु मादा के प्रजनन तंत्र में पहुँचते हैं । मूत्र मार्ग ( Urethra ) मूत्राशय से प्रारम्भ होकर शिश्न से गुजरकर उसके ( शिश्न के ) ऊपरी भाग में खुलता है । शिश्न में अत्यधिक रक्त की आपूर्ति होती है । साथ - ही - साथ इसकी पेशियाँ भी विशिष्ट प्रकार की होती है । जो इसे कड़ापन प्रदान करती है । शिश्न शुक्र ( Semen ) को शरीर से बाहर निकालकर मादा की योनि ( Vagina ) के भीतर तक पहुँचाता है ।

मादा जनन तंत्र ( Female reproductive system ) : मादा जनन तंत्र में निम्नलिखित जनन अंग होते हैं -1 , अण्डाशय , 2. अण्डवाहिनियाँ , 3. गर्भाशय , 4. योनि ।

1. अण्डाशय ( ovaries ) : प्रत्येक मादा में एक जोड़ा अंडाशय होता है । ये उदर के निचले भाग में श्रोणिगुहा ( Pelvic cavity ) में दोनों ओर दाएँ और बाएँ एक एक स्थित होते हैं । प्रत्येक अंडाशय एक अंडाकार ( Oval ) रचना होती है । प्रत्येक अंडाशय लगभग 4 सेमी लम्बा , 2.5 सेमी चौड़ा और 1.5 सेमी मोटा होता है । अंडाशय पेरिटोनियम ( Peritoneum ) झिल्ली द्वारा उदर ( Abdomen ) से सटा रहता है । अंडाशय के भीतर अंडाणुओं का अंडजनन द्वारा निर्माण होता है । अंडाशय का बाह्य स्तर एपिथीलियम का बना होता है जिसे जनन एपिथीलियम ( Gerninal epithelium ) कहते हैं । अंडाशय का आन्तरिक भाग ततुओं एवं संयोजी ऊतक ( Connective tissue ) का बना होता है , जिसे स्ट्रोमा ( Strorma ) कहते हैं । अंडाशय का मुख्य कार्य अंडाणु ( Ovum ) पैदा करना है । अंडाशय से दो हार्मोन आस्ट्रोजन ( Oestrogen ) तथा प्रोजेस्टेरान ( Progesterone ) का स्राव ( Secretion ) होता है , जो ऋतुस्राव ( Menstruation ) को नियंत्रित करते हैं ।

2.अण्डवाहिनियाँ ( Fallopian tube ) : अण्डवाहिनी या फैलोपियन नलिका की संख्या दो होती है , जो गर्भाशय के ऊपरी भाग के दोनों बगल लगी रहती है । प्रत्येक फेलोपियन नलिका लगभग 10 सेमी लम्बी होती है । इस नलिका का एक सिरा गर्भाशय से सम्बद्ध रहता है और दूसरा सिरा अण्डाशय की ओर अंगुलियों के समान झालर बनाता है । इस रचना को फिम्ब्री ( Fimbri ) कहते हैं । अण्डाणु जब अण्डाशय से बाहर निकलता है तब वह फिम्ब्री द्वारा पकड़ लिया जाता है । इसके बाद अण्डाणु फेलोपियन नलिका की गुहा में पहुँच जाता है । फेलोपियन नलिका से अण्डाणु गर्भाशय में पहुँचता है । फेलोपियन नलिका का प्रमुख कार्य फिम्ब्री द्वारा अण्डाणु को पकड़ना और गर्भाशय में पहुँचाना है । 

3. गर्भाशय ( Uterus ) : यह एक नाशपाती के समान रचना होती है जो श्रोणिगुहा ( Pelvic Cavity ) में स्थित होती है । यह सामान्यतः 7.5 सेमी लम्बा , 5 सेमी चौड़ा तथा 3.5 सेमी मोटा होता है । इससे ऊपर की तरफ दोनों ओर अर्थात् दाएँ और बाएँ कोण पर अण्डवाहिनी खुलती है । इसका निचला भाग सँकरा होता है जिसे ग्रीवा ( Cervix ) कहते हैं । ग्रीवा आगे की ओर योनि में परिवर्तित हो जाता है । गर्भाशय का निचला छिद्र इसी में खुलता है । गर्भाशय की भित्ति पेशीय ( Muscular ) होती है , जिसके भीतर खाली जगह होती है । गर्भाशय की भित्ति के अंदर की ओर एक कोशिकीय स्तर होता है जिसे गर्भाशय अंत : स्तर ( Endometrium ) कहते हैं । गर्भाशय का प्रमुख कार्य निषेचित अण्डाणुओं को भ्रूण परिवर्द्धन हेतु उचित स्थान प्रदान करना है ।

4. योनि ( Vagina ) : यह एक नली के समान रचना होती है । यह लगभग 7.5 सेमी लम्बी होती है । यह बाहर के तल से गर्भाशय तक फैली रहती है । इसके सामने मूत्राशय ( Urinary bladder ) तथा नीचे मलाशय ( Rectum ) स्थित होता है । योनि की दीवार पेशीय ऊतक की बनी होती है । योनि का एक सिरा मादा जनन छिद्र के रूप में बाहर खुलता है तथा दूसरा सिरा पीछे की ओर गर्भाशय की ग्रीवा ( Cervix ) से जुड़ा रहता है । योनि के शरीर के बाहर खुलने वाले छिद्र को योनि द्वार ( Vaginal orifice ) कहते हैं । योनि की दीवार में वल्बोरीथल ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं , जिससे एक चिपचिपा द्रव निकलता है । यह द्रव संभोग के समय योनि को चिकना बनाता है । योनि एवं मूत्रवाहिनी के द्वार के ऊपर एक छोटा - सा मटर ( Pea ) के दाने के जैसा उभार स्थित होता है जिसे भग शिश्निका ( Clitoris ) कहते हैं । यह एक अत्यन्त ही उत्तेजक अंग होता है , जिसे स्पर्श करने या शिश्न ( Penis ) के सम्पर्क में आने पर स्त्री को अत्यधिक सुखानुभूति होती है । मैथून के समय शिश्न से वीर्य निकलकर योनि में गिरता है तथा योनि इसे गर्भाशय में पहुँचा देती है । 

अण्डोत्सर्ग ( Ovulation ) : अण्डाणु के परिवर्द्धन के साथ - साथ गर्भाशय भी परिवर्द्धित होता है । परिवर्द्धन की ये क्रियाएँ हार्मोन द्वारा नियंत्रित होती हैं । 28 दिन की सक्रियता में मानव अण्डाशय सामान्यतः केवल एक अण्डाणु की उत्पत्ति करता है । अण्डाशय द्वारा अण्डाणु की निर्मुक्ति को अण्डोत्सर्ग ( Ovulation ) कहते हैं । 

ऋतुस्राव चक्र ( Menstruation cycle ) : ऋतुस्राव चक्र का पाया जाना प्राइभेट्स का प्रमुख लक्षण है । स्त्री का प्रजनन काल 12-13 वर्ष की उम्र में प्रारम्प होता है जो 40-50 वर्ष की उम्र तक चलता है । इस प्रजनन काल में गर्भावस्था को छोड़कर प्रति 26 से 28 दिनों की अवधि पर गर्भाशय से रक्त तथा इसकी आन्तरिक दीवार से श्लेष्म का स्राव होता है । यह स्राव तीन - चार दिनों तक चलता है । इसे ही रजोधर्म या मासिक धर्म या ऋतुस्राव चक्र ( Menstruation cycle ) कहते हैं । ऋतुस्राव के प्रारम्भ होने के 14 दिन बाद अण्डोत्सर्ग होता है । यह अण्डोत्सर्ग दोनों अण्डाशयों से बारी - बारी से होती है । अण्डोत्सर्ग के कुछ समय के पश्चात अण्डाणु अण्डवाहिनी में पहुँच जाता है और 15 वें से 19 वें दिन तक इसमें रहता है । इस बीच यदि स्त्री सम्भोग करे , तो यह अण्डाणु निषेचित होकर गर्भाशय में चला जाता है , अन्यथा वह अगले ऋतुस्राव में बाहर निकल जाता है । लड़कियों में मासिक धर्म या ऋतुस्राव चक्र प्रथम बार 12-13 वर्ष की उम्र में प्रारम्भ होता है , इसे मेनार्की ( Menarche ) कहते हैं ।

अण्डोत्सर्ग के पश्चात पुटक ( Follicle ) पीले रंग का हो जाता है । अब इस पुटक को पीत पिण्ड या कॉर्पस ल्यूटियम ( Corpus leuteum ) कहते हैं । पीतपिण्ड या कॉर्पसल्यूटियम के परिवर्द्धन का भी नियंत्रण हार्मोन द्वारा होता है । कॉर्पस ल्यूटियम द्वारा एक हार्मोन का स्राव होता है जिसे प्रोजेस्टेरॉन ( Progesterone ) कहते हैं । 

गर्भधारण हेतु उपयुक्त परिस्थितियाँ ( Favourable conditions for pregnancy ) : सम्भोग क्रिया द्वारा हमेशा गर्भधारण नहीं होता है । इसके लिए कुछ परिस्थितियों का अनुकूल होना आवश्यक है ये परिस्थितियाँ हैं 

1. गर्भधारण के लिए आवश्यक है कि ऋतुस्राव के 14 वें दिन के आस पास या 11 वें से 18 वें दिन के अन्दर सम्भोग अनिवार्य रूप से हो ।

2. अण्डवाहिनी ( Fallopian tube ) एवं गर्भाशय सूजन एवं संक्रमण से मुक्त हो ।

3. वीर्य ( Semen ) में शुक्राणुओं ( Sperms ) की संख्या सामान्य हो ।

मानव प्रजनन की क्रिया विधि ( Mechanism of human reproduction ) : मानव के प्रजनन में तीन अवस्थाएँ होती हैं । ये हैं 

1. युग्मक जनन ( Gametogenesis ) 

2. निषेचन ( Fertilization ) 

3. भ्रूणीय विकास ( Embryonic development )

1. युग्मक जनन ( Gametogenesis ) : वृषण ( Testes ) एवं अण्डाशयों ( Ovaries ) में युग्मकों के निर्माण की प्रक्रिया को युग्मक जनन ( Gametogenesis ) कहते हैं । युग्मकों का निर्माण वृषण तथा अण्डाशय की जनन कोशिकाओं में अर्द्धसूत्री विभाजन ( Meiosis ) द्वारा होता है । वृषण में शुक्राणुओं ( Sperms ) का निर्माण शुक्रजनन ( Spermatogenesis ) तथा अण्डाणु ( Ovum ) का अण्डाशय में निर्माण अण्डजनन ( Oogenesis ) कहलाता है ।

शुक्रजनन ( Spermatogenesis ) एवं अण्डजनन ( Oogenesis ) में समानता एवं विभिन्नताएँ

समानताएँ ( Similarities ) :

अण्डजनन

1.शुक्राणुओं का निर्माण जनन एपिथीलियम की कोशिकाओं एपिथीलियम की कोशिकाओं के  विभाजन से होता है ।

2.शुक्रजनन क्रिया में गुणन , वृद्धि एवं परिपक्वन तीनों  प्रावस्थाएँ होती हैं । 

3.शुक्रजनन के  परिपक्वन प्रावस्था में प्रावस्था में दो विभाजन होते  हैं ।

4. समसूत्री विभाजन द्वारा गुणन प्रावस्था में कोशिकाएँ संख्या गुणन प्रावस्था में कोशिकाएँ संख्या में वृद्धि करती है ।

5. इसमें अन्तिम उत्पाद नर युग्मक ( Male gametes ) बनते हैं ।

शुक्रजनन 

1. अण्डाणुओं का निर्माण भी जनन एपिथीलियम की कोशिकाओं एपिथीलियम की कोशिकाओं के विभाजन से होता है

2. अण्डजनन क्रिया में भी शुक्रजनन की तरह तीनों प्रावस्थाएँ होती हैं । 

3. अण्डजनन के परिपक्वन भी शुक्रजनन के परिपक्वन प्रावस्था की तरह दो विभाजन होता है । 

4. इसमें भी समसूत्री विभाजन द्वारा गुणन प्रावस्था में कोशिकाएँ संख्या  में वृद्धि करती हैं । 

5. इसमें अन्तिम उत्पाद मादा युग्मक   ( Femalegametes ) बनते हैं ।

विभिन्नताएँ ( Dissimilarities ) :

शुक्रजनन  

1. एक स्पर्मेटोसाइट से चार शुक्राणु का निर्माण होता है ।

2.शुक्रजनन क्रिया में कोई भी ध्रुव कोशिका नहीं बनती है ।

3. स्पर्मेटोसाइट से बने चारों शुक्राणु निषेचन क्रिया में भाग ले सकता है ।

4. शुक्राणु छोटे एवं सक्रिय होते हैं ।

अण्डजनन

1. एक ऊगोनिया ( Oogonia ) से  केवल एक अण्डाणु का निर्माण होता है । 

2. अण्डजनन में दो या तीन ध्रुव  कोशिकाएँ बनती है ।

3. ऊगोनिया से बना अण्डाणु निषेचन क्रिया में भाग ले सकता है ।  धूव कोशिकाए निषेचन क्रिया में भाग नहीं लेती हैं । 

4. अण्डाणु बड़े एवं निष्क्रिय होते हैं ।

2. निषेचन ( Fertilization ) : नर युग्मक ( शुक्राणु ) एवं मादा युग्मक ( अण्डाणु ) के आपस में सम्मिलन से युग्मनज ( Zygote ) बनने की क्रिया को निषेचन कहते हैं । मनुष्य में अन्तः निषेचन ( Internal fertilization ) पाया जाता है । मनुष्य में निषेचन की क्रिया मादा की अण्डवाहिनी ( Fallopian tube ) में होती है । इस क्रिया में नर युग्मक का केवल केन्द्रक भाग लेता है जबकि सम्पूर्ण मादा युग्मक इसमें भाग लेता है ।

 3. भ्रूणीय विकास ( Embryonic development ) : निषेचन क्रिया के बाद बना युग्मनज तीव्रता से समसूत्री विभाजनों द्वारा विभाजित होने लगता है , और अन्ततः गर्भाशय में एक पूर्ण विकसित शिशु को स्थापित करता है । निषेचन के लगभग 10 सप्ताह तक के विकसित युग्मनज को भ्रूण ( Embryo ) तथा युग्मनज में होने वाले विभिन्न क्रमिक परिवर्तनों को भ्रूणीय विकास कहते हैं । भ्रूण में 5 वें सप्ताह तक तीन जननिक स्तरों का निर्माण हो जाता है । ये तीन जननिक स्तर हैं—

 ( a ) एण्डोडर्म ( Endoderm )

 ( b ) मीसोडर्म ( Mesoderm ) तथा

( c ) एक्टोडर्म ( Ectoderm )

 इसके पश्चात इन स्तरों से विभिन्न शारीरिक अंगों का निर्माण होता है । भ्रूण में 7 वें से 9 वें सप्ताह के मध्य तक हाथ , पैर , श्वसन तंत्र , तंत्रिका तंत्र एवं पाचन तंत्र बन जाते हैं । तीसरे माह में भ्रूण में कंकाल तंत्र बन जाता है । चौथे माह में सिर एवं शरीर पर रोएँ , पाँचवें माह में आहारनाल , रुधिर व अस्थिमज्जा बन जाते हैं । छठे माह में भ्रूण छोटे शिशु का रूप धारण कर लेता है । सातवें माह तक शिशु के सभी अंग अच्छी तरह कार्य करने लगते हैं । आठवें माह में उसमें वसा का जमाव होने लगता है जबकि नवें माह में वह जन्म के लिए तैयार हो जाता है । भ्रूण का पोषण जरायु ( Chorin ) एम्नियान एवं अपरा ( Placenta ) द्वारा होता है । मनुष्य में गर्भाधान काल 280 दिनों का होता है । इसके पश्चात प्रसव द्वारा शिशु मादा के शरीर के बाहर आ जाता है । 

महत्वपूर्ण तथ्य : 

1. यौवनारम्भ ( Puberty ) : मनुष्य के जीवन काल में जब उसमें जनन क्षमता आरम्भ होती है , वह समय यौवनारम्भ ( Tuberty ) कहलाता है । जनन की क्षमता स्त्रियों में सामान्यतः 12-16 वर्ष की उम्र में प्रारम्भ होती है जबकि 40-50 वर्ष की आयु में समाप्त हो जाती है । पुरुषों में भी यौवनारम्भ प्रायः 12-16 वर्ष की उम्र में होता है जबकि 50 वर्ष की उम्र के बाद धीरे - धीरे जनन क्षमता घटती जाती है ।

2. गौण लैंगिक लक्षण ( Secondary Sexual Characters ) : यौवनारम्भ के समय मनुष्य के शरीर में अनेक प्रकार के परिवर्तन होते हैं तथा अनेक ऐसे परिवर्तन होते हैं जो मादा को नर से विभेदित करते हैं । इन लक्षणों को गौण लैंगिक लक्षण कहते हैं । 

3. मेनार्की ( Menarche ) : लड़कियों में मासिक चक्र का प्रथम बार प्रारम्भ होना ( 12-13 वर्ष की उम्र में ) मेनार्की ( Menarche ) कहलाता है । 

4. रजोनिवृति ( Menopause ) : स्त्रियों में 40-50 वर्ष की उम्र के पश्चात ऋतु स्राव नहीं होता है । इसे ही रजनोवृत्ति ( Menopause ) कहते हैं ।

5. अण्डोत्सर्ग ( Ovulation ) : अण्डाशय द्वारा अण्डाणु की निर्मुक्ति को अण्डोत्सर्ग कहते हैं ।

6. जरायु ( Chorion ) : गर्भ की सबसे बाहरी झिल्ली को जरायु कहते हैं । 

7. अंकुर ( Villi ) : जरायु से अंगुलियों के आकार के अनेक प्रवर्द्ध निकलते हैं , जिन्हें अंकुर कहते हैं । 

8. अपरा ( Placenta ) : अंकुर और गर्भाशय कोशिकीय परत के सम्पर्क क्षेत्र को अपरा कहते हैं । 9. नाभिरज्जु ( Umbilical cord ) : गर्भ अपरा से एक मजबूत डोरी जैसी रचना से जुड़ा रहता है जिसे नाभिरज्जु कहते हैं । यह माता और गर्भ के बीच सम्पर्क अंग का कार्य करता है । 

10. युग्मनज ( Zygote ) : निषेचित अण्डाणु को युग्मनज कहा जाता है । 

11. कृत्रिम वीर्य सेचन ( Artificial insemination ) : जब शुक्राणु मादा की योनि ( Vagina ) में कृत्रिम विधि द्वारा स्थानान्तरित किये जाते हैं तो इस क्रिया को कृत्रिम वीर्य सेचन कहते हैं । 

12. आन्तरिक निषेचन ( Internal fertilization ) : उच्च स्तनधारियों में निषेचन की क्रिया मादा के शरीर के अंदर होती है । इस प्रकार के निषेचन को आन्तरिक निषेचन कहते हैं । 

13. वीर्य सेचन ( Insemination ) : मैथून के समय नर के शिश्न द्वारा मादा की योनि में वीर्य जमा करना वीर्य सेचन या इनसेमिनेशन कहलाता है ।

पेशी तंत्र

पेशियाँ त्वचा के नीचे का माँस होती है । यह अंगों में गति उत्पन्न करता है एवं शरीर को सुदृढ़ बनाती है । संपूर्ण शरीर में 500 से अधिक पेशियाँ हैं । पेशियाँ प्रेरक उपकरण का सक्रिय भाग है । इनके संकुचन के फलस्वरूप विभिन्न गतिविधियाँ होती हैं । लम्बे समय तक कठोर कार्य के पश्चात् मांसपेशियों में थकान का अनुभव लैक्टिक अम्ल ( Lactic acid ) के संचय के कारण होता है । कार्य के आधार पर पेशियों को दो वर्गों में विभाजित किया गया है । ये हैं

1. ऐच्छिक पेशियाँ ( Voluntary muscles ) : यह रेखित पेशी ऊतक से बनी होती है तथा मनुष्य के इच्छानुसार संकुचित हो जाती है । यह सिर , कांड तथा अग्रांगों में पायी जाती है । यह शरीर के आन्तरिक अंगों जैसे जिह्वा , कण्ठ आदि में भी पायी जाती है ।

2. अनैच्छिक पेशियाँ ( Involuntary muscles ) : यह अरेखित ( चिकनी ) पेशियाँ ऊतक की बनी होती हैं । इन पेशियों का संकुचन मनुष्य के इच्छानुसार नियंत्रित नहीं होता है । ये आन्तरिक अंगों , रुधिर वाहिकाओं तथा त्वचा की दीवारों में पायी जाती हैं ।





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