मानव शरीर के लिए आवश्यक खनिज

1. सोडियम : यह मुख्ततः कोशिका बाह्य द्रव में धनायन के रूप में होता है तथा वह निम्नलिखित कार्यों से सम्बद्ध होता है ( a ) पेशियों का संकुचन ( b ) तंत्रिका तंतु में तंत्रिका आवेग का संचरण तथा ( c ) शरीर में धनात्मक विद्युत अपघट्य संतुलन बनाए रखना ( d ) यह रक्त दाब नियंत्रित रखने में सहायक होता है । स्रोत : सोडियम का मुख्य स्रोत साधारण नमक , मछली , अण्डे , माँस , दूध आदि हैं ।

दैनिक आवश्यकता : 2.5g प्रतिदिन

2. पोटैशियम : यह सामान्यतः कोशिका द्रव्य में धनायन के रूप में पाया जाता है । यह लगभग सभी खाद्य पदार्थों में उपस्थित रहता है । यह निम्न अभिक्रियाओं के लिए आवश्यक है --- ( a ) कोशिका में होने वाली अनेक अभिक्रियाएँ ( b ) पेशीय संकुचन ( c ) तंत्रिका आवेग का संचरण ( d ) शरीर में विद्युत अपघट्य संतुलन को बनाए रखना

3. कैल्सियम : यह विटामिन D के साथ हड्डियों तथा दाँतों को दृढ़ता प्रदान करता है । यह रुधिर के स्कन्दन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । यह पेशीय संकुचन प्रक्रिया से सम्बद्ध होता है । यह पनीर , दूध , अण्डे , हरी सब्जियाँ , साबुत अन्न , चना , रागी , मछली , कसावा आदि में मुख्य रूप से पाया जाता है । मनुष्य के लिए कैल्सियम की दैनिक आवश्यकता लगभग 1.2g है ।

 4. फॉस्फोरस : यह मानव शरीर के लिए एक आवश्यक तत्व है । यह कैल्सियम से सम्बद्ध होकर दाँतों तथा हड्डियों को दृढ़ता प्रदान करता है । यह शरीर के तरल पदार्थों के संरचनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है । वह वसा एवं कार्बोहाइड्रेट के पाचन में सहायता करता है । हड्डियों के विकास के लिए फॉस्फोरस अत्यन्त आवश्यक है । दूध , पनीर , हरी पत्तेदार सब्जियाँ , बाजरा , रागी , जई . आँटा , कलेजी , गुर्दे आदि फॉस्फोरस प्राप्ति के मुख्य स्रोत हैं । मानव शरीर के लिए इसकी दैनिक आवश्यकता लगभग 1.2 g है |

5. लौड़ : लोहा लाल रुधिर कणिकाओं ( RBC ) में हीमोग्लोबिन के बनने के लिए आवश्यक है । दूसरे शब्दों में , लौह लवण से रक्त का हीमोग्लोबिन बनता है जो शरीर में ऑक्सीजन का संवाहक है । लोहे की कमी के परिणामस्वरूप रक्त की वह क्षमता कम हो जाती है , जिसे अरक्तता कहते हैं । लौह लवण की कमी अधिकांशतया बालकों तथा महिलाओं में पायी जाती है । इसकी कमी से शरीर में क्षीणता आती है तथा अत्यधिक थकान महसूस होती है । अरबतता की तीव्र अवस्था में आँखों के सामने अँधेरा छा जाना , चक्कर आना , भूख नहीं लगना इत्यादि लक्षण पाये जाते हैं । यकृत लौह का सर्वोत्तम स्रोत है । इसके अतिरिक्त अण्डा , पालक , मेथी , अनाज , मेवे इत्यादि में भी लौह तत्व पाया जाता है । एक वयस्क व्यक्ति को एक दिन में लगभग 20mg  लोहा आवश्यक होता है । लोहा ऊतक ऑक्सीकरण के लिए भी आवश्यक है ।

6 . आगहीन : यह थायरायड ग्रन्थि द्वारा सावित थॉयरॉक्सिन ( Thyroxine ) हार्मोन के संश्लेषण के लिए आवश्यक है । इसकी कमी से घेघा या गलगण्ड ( Goitre ) नामक हीनताजन्य रोग हो जाता है । गलगण्ड के बाद क्रेटनिज्म ( Cretnism ) की अवस्था आती है जिससे प्रभावित व्यक्ति में शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होने लगता है । इससे उसका तंत्रिका तंत्र भी प्रभावित होता है । आयोडीन का मुख्य स्रोत समुद्री मछली , समुद्री भोजन . हरी पत्तेदार सब्जियाँ . आयोडीन युक्त नमक आदि हैं ।

7. जान ( Water ) : जल मानव आहार का एक महत्वपूर्ण भाग है । मानव शरीर के भार का लगभग 65-75 % भाग जल होता है । उल्टी ( वमन ) तथा अतिसार से मानव शरीर में जल की कमी हो जाती है । इस अवस्था को निर्जलीकरण ( Dehydration ) कहते हैं । निर्जलीकरण की मृत्यु तक हो सकती है । जल मानव शरीर के ताप को स्वेदन ( पसीना ) तथा वाष्पन द्वारा नियंत्रित रखता है । यह शरीर के अपशिष्ट पदार्थों के उत्सर्जन का महत्वपूर्ण माध्यम है । शरीर में होने वाली अधिकतर जैव रासायनिक अभिक्रियाएँ जलीय माध्यम में सम्पन्न होती हैं । यह एक अच्छा विलायक है । यह शरीर की सभी कोशिकाओं का महत्वपूर्ण घटक है । सामान्यतः वयस्क व्यक्ति को औसतन 4-5 लीटर जल प्रतिदिन पीना चाहिए ।

सन्तुलित आहार ( Balanced diet ) : वह आहार जिसमें शरीर की वृद्धि एवं स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक सभी पोषक पदार्थ एवं तत्त्व निश्चित अनुपात में उपस्थित हों , सन्तुलित आहार कहलाता है । यह व्यक्ति की आयु , लिंग , स्वास्थ्य एवं व्यवसाय पर निर्भर करता है | सामान्यतः एक सामान्य कार्य करने वाले औसत युवा मनुष्य को 300 ) मे 3500 कैलोरी ऊर्जा उत्पन्न करने लायक भोजन की आवश्यकता होती है । यह ऊर्जा प्राप्त करने के लिए भोजन में लगभग 90 ग्राम प्रोटीन , 400 से 500 ग्राम कार्बोहाइड्रेट , 50 से 70 ग्राम बसा तथा अन्य आवश्यक तत्त्वों का होना आवश्यक । बाल्यावस्था में जब वृद्धि तेज होती है तब अपेक्षाकृत अधिक भोजन की आवश्यकता होती है । जबकि प्रौढ़ावस्था में अपेक्षाकृत कम भोजन की आवश्यकता होती है । पुरुष और बालकों को स्त्रियों तथा बालिकाओं की तुलना में अधिक भोजन चाहिए । इसी प्रकार शीतकाल या ठण्डी जलवायु में ग्रीष्मकाल या गर्म जलवायु की तुलना में अधिक भोजन की आवश्यकता होती है । जो व्यक्ति अधिक परिश्रम करते हैं और सक्रिय जीवन व्यतीत करते हैं , उनके भोजन की मात्रा अधिक होनी चाहिए ।

 

अल्पपोषण ( Under nutrition ) : लम्बी अवधि तक भोजन की मात्रा कम लेने से उत्पन्न स्थिति को अल्प पोषण कहते हैं ।

अतिशय पोषण ( Overnutrition ) : लम्बी अवधि तक अत्यधिक भोजन लेने से उत्पन्न स्थिति को अतिशय पोषण कहते हैं । इसके परिणामस्वरूप मोटापा , धमनी काठिन्य रक्त सम्बन्धी विकार , मधुमेह आदि हो जाते हैं ।

असन्तुलित आहार ( Unbalanced diet ) : जब आहार में कुछ पोषक अधिक मात्रा में तथा कुछ अन्य पोषक नगण्य मात्रा में उपस्थित रहते हैं तब ऐसा आहार असंतुलित आहार कहलाता है ।

विशिष्ट पोषक तत्व की कमी : आहार में किसी पोषक विशेष की कमी अथवा अभाव होने से विशिष्ट हीनताजन्य विकार उत्पन्न हो जाते हैं ।


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