तंत्रिका तंत्र ( nervous system )



मानव शरीर का वह तंत्र जो सोचने , समझने तथा किसी चीज को याद रखने के साथ ही शरीर के विभिन्न अंगों के कार्यों में सामंजस्य तथा संतुलन स्थापित करने का कार्य करता है , तंत्रिका तंत्र कहलाता है । तंत्रिका तंत्र संवेदी अंगों , तंत्रिकाओं , मस्तिष्क , मेरुरज्जु एवं तंत्रिका कोशिकाओं का बना होता है । तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय का कार्य मुख्यतया मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु के द्वारा किया जाता है । 

तत्रिका तंत्र के कार्य : तंत्रिका तंत्र निम्नलिखित कार्य करता है 

1. तंत्रिका तंत्र विभिन्न अंगों की भिन्न भिन्न क्रियाओं को संचालित एवं नियंत्रित करता है । 

2. यह समस्त मानसिक कार्यों का नियंत्रण करता है । 

3. यह जन्तु को बाहरी वातावरण के अनुसार प्रतिक्रिया करने में मदद करता है । 

4. यह विभिन्न ग्रन्थियों एद ऊतकों के प्रकार्यों में समन्वय बनाकर शरीर के आन्तरिक पर्यावरण का नियमन करता है । 

मानव में तंत्रिका तंत्र तीन भागों में विभक्त रहता है -1 . केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र ( Central nervous system ) , 2. परिधीय तंत्रिका संत्र ( Peripheral nervous system ) तथा 3.स्वायत्त तंत्रिका तंत्र ( Autonomic nervous system ) 

1. केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र ( Central nervous systern ) : तंत्रिका तंत्र का वह भाग जो सम्पूर्ण शरीर तथा स्वयं तंत्रिका तंत्र पर नियंत्रण रखता है , केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र कहलाता है । मस्तिष्क ( Brain ) तथा मेरुरज्जु दोनों मिलकर केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र की स्थापना करते हैं । मस्तिष्क मेरुरज्जु का ही बढ़ा हुआ भाग है । 

मस्तिष्क ( Brain ) : मस्तिष्क मानव शरीर का केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण अंग है और यह आदेश व नियंत्रण तंत्र की तरह कार्य करता है । यह ऐच्छिक गमन , शरीर के संतुलन , प्रमुख अनैच्छिक अंगों के कार्य , तापमान नियंत्रण , भूख एवं प्यास , परिवहन , लय , अनेक अन्तःस्रावी ग्रन्थियों की क्रियाएँ और मानव व्यवहार का नियंत्रण करता हैं । यह देखने . सुनने . बोलने की प्रक्रिया , याददाश्त . कुशाग्रता , भावनाओं और विचारों का भी स्थल है । इस प्रकार मस्तिष्क सम्पूर्ण शरीर तथा स्वयं तत्रिका तंत्र का नियंत्रण कक्ष है । मानव का मस्तिष्क मस्तिष्क कोश या क्रेनियम ( Cranium ) के अंदर अच्छी तरह सुरक्षित रहता है । क्रेनियम मस्तिष्क को बाहरी आघातों से बचाता है । मानव मस्तिष्क का औसत भार 1400 ग्राम होता है । इसके चारों ओर मेनिनजेज ( Meringes ) नामक एक आवरण पाया जाता है । यह आवरण तीन स्तरों का बना होता है । इस आवरण की सबसे बाहरी परत को ड्यूरामेटर ( Duramater ) , मध्य परत को अरेकनॉइड ( Arachnoid ) तथा सबसे अंदर की परत को पायामेटर ( piamater ) कहते हैं । मेनिनजेज कोमल मस्तिष्क को बाहरी आघातों तथा दबाव से बचाता है । मेनिनजेज तथा मस्तिष्क के बीच सेरीब्रोस्पाइनल द्रव ( Cerebrospinal fluid ) भरा रहता है । मस्तिष्क की गुहा भी इसी द्रव्य से भरी रहती है । सेरीब्रोस्पाइनल द्रव मस्तिष्क को बाहरी आघातों से सुरक्षित रखने में मदद करता है । यह मस्तिष्क को नम बनाए रखता है । मानव का मस्तिष्क अन्य कशेरुकों  की अपेक्षा ज्यादा जटिल और विकसित होता है ।  इसका औसत आयतन लगभग 1650ml होता है । मानव मस्तिष्क को तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया गया है । ये हैं 

1.अग्रमस्तिष्क ( Forebrain )

2. मध्यमस्तिष्क ( Midbrain ) तथा 

3. पश्च मस्तिष्क ( Hindbrain ) अग्रमस्तिष्क ( Forebrainor Prosencephalon ) यह दो भागों में बँटा होता है 

( a ) प्रमस्तिष्क ( Cen brum ) : यह मस्तिष्क के शीर्ष , पार्श्व तथा पश्च भागों को बैंके रहता है । यह मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग है । यह सम्पूर्ण मस्तिष्क का लगभग दो - तिहाई हिस्सा होता है । यह एक अनुदैर्घ्य खाँच द्वारा दाएँ एवं बाएँ भागों में बँटा होता है , जिन्हें प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध ( Cerebral hemisphere ) कहते हैं । दोनों प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध तंत्रिका ऊतकों से बना कॉर्पस कैलोसम ( Corpus callosum ) नामक रचना के द्वारा एक - दूसरे से जुड़े रहते हैं । गोलार्द्ध में अनेक अनियमिताकार उभरी हुई रचनाएँ होती हैं जिन्हें गाइरस ( Cyrus ) कहते हैं । दो गाइरस के बीच अवनमन बाले स्थान को सल्कस ( Sulcus ) कहते हैं । इसके कारण प्रमस्तिष्क वल्कुट ( Cerebal cortex ) का बाहरी क्षेत्र ( Surface area ) बढ़ जाता है । कॉर्टेक्स सेरीबम का बाहरी मोटा धूमर आवरण है , जिसपर अलग अलग निर्दिष्ट केन्द्र होते हैं जो विभिन्न शारीरिक क्रिवाओं का नियंत्रण एवं समन्वयन कुशलतापूर्वक करते हैं । यह मस्तिष्क का अत्यन्त महत्वपूर्ण भाग है । यह बुद्धि और चतुराई का केन्द्र है । मानव में किसी बात को सोचने - समझने की शक्ति , स्मरण शक्ति , किसी कार्य को करने की प्रेरणा , घृणा , प्रेम , भय , हर्ष , कष्ट के अनुभव जैसी क्रियाओं का नियंत्रण और समन्वय सेरीब्रम द्वारा ही होता है । यह मस्तिष्क के अन्य भागों के कार्यों पर भी नियंत्रण रखता है । जिस व्यक्ति में सेरीब्रम औसत से छोटा होता है तथा गाइरस एवं सल्कस कम विकसित होते हैं , वह व्यक्ति सन्द बुद्धि का होता है ।

( b ) डाइएनसेफलॉन ( Diencephalon ) : यह अग्रमस्तिष्क का एक भाग है जो प्रमस्तिष्क गोलार्द्ध के द्वारा बँका होता है । यह अधिक या कम ताप के आभास तथा दर्द व रोने जैसी क्रियाओं का नियंत्रण करता है ।

 मध्य मस्तिष्क ( Midbrain or Mesencephalon ) : यह भाग मस्तिष्क के मध्य में स्थित होता है । यह मस्तिष्क स्टेम का ऊपरी भाग है । इसमें अनेक तंत्रिका कोशिकाएँ कई समूहों में उपस्थित होती हैं मध्य मस्तिष्क में संतुलन एवं आँख की पेशियों को नियंत्रित करने के केन्द्र होते हैं । 

मध्यमस्तिष्क दो भागों का बना होता है । ये हैं — कार्पोराक्वाड्रीजेमीन एवं सेरीब्रल पेडन्कल 

( a ) कार्पोराक्वाड्रीजेमीन : मध्य मस्तिष्क का ऊपरी भाग चार लोवनुमा उभारों का बना होता है , जिन्हें कॉर्पोराक्वाड्रीजेमीन कहते हैं । ये दृष्टि एवं श्रवण शक्ति पर नियंत्रण के केन्द्र होते हैं । 

( b ) सेरीब्रल पेडन्कल : यह तन्तुओं का बंडल होता है जो सेरीबल कॉर्टेक्स को मस्तिष्क के अन्य भागों तथा मेरुरज्जु से जोड़ता है । 

पश्चमस्तिष्क ( Hind brain or Rhomben cephalon ) : यह मस्तिष्क का सबसे पिछला भाग है । यह अनुमस्तिष्क या सेरीबेलम ( Cerebellum ) एवं मस्तिष्क स्टेम का बना होता है ।

( a ) अनुमस्तिष्क ( Cerebellum ) : इसे मेटेनसिफेलॉन भी कहते हैं । यह मुद्रा ( Posture ) , समन्वय , संतुलन , ऐच्छिक पेशियों की गतियों इत्यादि का नियंत्रण करता है । इसका मुख्य कार्य शरीर का संतुलन बनाए रखना है । यह शरीर के ऐच्छिक पेशियों के संकुचन पर नियंत्रण करता है । यह आन्तरिक कान के संतुलन भाग से संवेदनाएँ ग्रहण करता है । 

( b ) मस्तिष्क स्टेम ( Brain stem ) : इसके अन्तर्गत पोन्म वैरोलाई ( Pons varoli ) एवं मेडुला ऑब्नांगेटा ( Medullaoblongata ) आते हैं । 

( i ) पॉन्स वैरोलाई ( Pons varolii ) : तंत्रिका तंतुओं में निर्मित पॉन्स वैरोलाई मेडुला के अग्रभाग में स्थित होता है । यह श्वसन ( Respiration ) को नियंत्रित करता है । 

( ii ) मेडुला ऑब्लागेटा ( Medulla oblongata ) : यह एक बेलनाकार रचना होती है जो पीछे की ओर स्पाइनल कॉर्ड या मेरुरज्जु के रूप में पाया जाता है । स्पाइनल कॉई मस्तिष्क के पिछले सिरे से शुरू होकर रीढ़ की हड्डियों में न्यूरल कैनाल ( Neural canal ) के अन्दर से होता हुआ नीचे की ओर रीढ़ के अन्त तक फैला रहता है । इसी में अनैच्छिक क्रियाओं के नियंत्रण केन्द्र स्थित होते हैं । मेडुला द्वारा आवेगों का चालन मस्तिष्क और मेरुरज्जु के बीच होता है । मेडुला में अनेक तंत्रिका केन्द्र होते हैं , जो हृदय स्पन्दन या हृदय की धड़कन ( Heart beat ) , रक्त - चाप ( Blood pressure ) और श्वांस गति की दर ( Rate of respiration ) का नियंत्रण करते हैं । मस्तिष्क के इसी भाग द्वारा विभिन्न प्रतिवर्ती क्रियाओं जैसे - खाँसना ( Coughing ) , छींकना ( Sneezing ) , उल्टी करना ( Vomiting ) , पाचक रसों के स्राव इत्यादि का नियंत्रण होता है ।

मेरुरज्जु ( Spinal Cord ) : मेडुला ऑब्लांगटा का पिछला भाग मेरुरज्जु बनाता है ! मेरुरज्जु का अंतिम सिरा एक पतले सूत्र के रूप में होता है । मेरुरज्जु के चारों ओर भी ड्यूरोमेटर , ऑक्नायड और पॉयमेटर का बना आवरण पाया जाता है । मेरुरज्जु बेलनाकार खोखली तथा पृष्ठ एवं प्रतिपृष्ठ तल पर चपटी होती है । इसकी दोनों सतहों पर एक - एक खाँच पायी जाती है जिन्हें क्रमशः डार्सल फिशर एवं वेन्ट्रल फिशर ( Dorsal fissure and Central fissure ) कहते हैं । मेरुरज्जु के मध्य एक सँकरी नाल पायी जाती है जिसे केन्द्रीय नाल ( Central canal ) कहते हैं । केन्द्रीय नाल में सेरिब्रोस्पाइनल द्रव भरा रहता है । केन्द्रीय नाल के चारों ओर मेरुरज्जु का मोटा भाग दो भागों में बँटा होता है । भीतरी स्तर को धूसर पदार्थ ( Crey matter ) तथा बाहरी स्तर को श्वेत पदार्थ ( White matter ) कहते हैं । धूसर पदार्थ तंत्रिका कोशिकाओं उनके डेन्ड्रान्स तथा न्यूरोम्लिया प्रबर्द्धा का बना होता है जबकि श्वेत पदार्थ मेड्युलेटेड तंत्रिका तन्तुओं और का बना होता है ।

मेरुरज्जु के कार्य : मेरुरज्जु के दो प्रमुख कार्य हैं 

( a ) यह प्रतिवर्ती क्रियाओं का नियंत्रण एवं समन्वयन करती है । 

( b ) यह मस्तिष्क से आने - जाने वाले उद्दीपनों का संवहन करती है । 

2. परिधीय तंत्रिका तंत्र ( Peripheral nervous system ) : परिधीय तंत्रिका तंत्र , मस्तिष्क एवं मेरुरज्जु से निकलने वाली तंत्रिकाओं का बना होता है , जिन्हें क्रमशः कपालीय तंत्रिकाएँ एवं मेरुरज्जु तंत्रिकाएँ कहते हैं । मनुष्य में 12 जोड़ी कपालीय तंत्रिकाएँ एवं 31 जोड़ी मेरुरज्जु तंत्रिकाएँ होती हैं । 

3.स्वायत्त या स्वचालित तंत्रिका तंत्र ( Autornomic nervous System ) : स्वायत्त तंत्रिका तंत्र कुछ मस्तिष्क एवं कुछ मेरुरज्जु तंत्रिकाओं का बना होता है । यह शरीर के सभी आन्तरिक अंगों व रक्त वाहिनियों को तंत्रिकाओं की आपूर्ति करता है । स्वायत्त तंत्रिका तंत्र की अवधारणा को सर्वप्रथम लैंगली महोदय ने 1921 ई . में प्रस्तुत किया था । स्वायत्त तंत्रिका तंत्र के दो भाग होते हैं । ये हैं— 

( a ) अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र ( Sympathetic nervous system ) 

( b ) परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र ( Parasympathetic nervous system ) |

दोनों तंत्र केन्द्रीय तथा परिधीय तंत्रों से पूर्णतया स्वतंत्र नहीं होते हैं क्योंकि इनका निर्माण केन्द्रीय एवं परिधीय तंत्रिका तंत्रों द्वारा ही होता है । 

( a ) अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र ( Sumpatheticnervous system ) : इसे थोरेकोलम्बर आऊट फ्लो भी कहते हैं क्योंकि जो प्रोगेन्गलियोनिक तन्तु होते हैं , वह स्पाइनल कॉई को थोरेसिक तथा लम्बर क्षेत्र में ही संलग्न ( Join ) करते हैं । यह एक जोड़ा गैन्गलियोनिक श्रृंखला को रखते हैं जो कि स्पाइनल कॉई के दोनों ओर गर्दन से उदर तक रहता है । तंत्रिका तंतु गैन्गलिया को विसरल अंगों तथा केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से जोड़ती है । वे तंत्रिका तन्तु जो गैन्गलिया को केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से जोड़ते हैं उन्हें मेड्युलेटेड तंत्रिका तंतु कहते हैं । प्रीगैन्गलियोनिक तंत्रिका तन्तु स्पाइनल कॉर्ड से निकलते हैं तथा स्पाइनल तंत्रिकाओं की अधर मूल के पास होते हैं । वे तंत्रिका तंतु जो गैन्गिलिया को अंगों से जोड़ते हैं उन्हें नॉन मेड्यूलेटेड तंत्रिका तंतु या पोस्ट गैन्गलियोनिक तंत्रिका तन्तु कहते हैं । प्री - गैन्गलियोनिक फाइबर्स एमीटाइलकॉलीन तथा पोस्ट गैन्गलियोनिक फाइबर्स सिम्पेथीन सावित करते हैं । 

( b ) परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र ( Parasympathetic nervous system ) : यह युग्मित गैन्गलियोनिक श्रृंखला का बना होता है जो मस्तिष्क से आरम्भ होता है तथा स्पाइनल कॉर्ड के सेक्रल भाग से भी उत्पन्न होती है पेरासिम्पैथेटिक गैन्गलिया सिर , गर्दन और सेक्रल क्षेत्र में रहता है । वह उन सभी अंगों को नर्व ( Nerve ) सप्लाई करता है जिन्हें सिम्पैथेटिक सिस्टम सप्लाई करता है । 

सिम्पैथेटिक तथा पैरा सिम्पैथेटिक तत्रिका समान अंगों को नर्व सप्लाई करती है किन्तु इनका असर एक - दूसरे से विपरीत होता है । 

अनुकम्पी तंत्रिका तत्र के कार्य 

1. यह आँख की पुतलियों को फैलाता है । 

2. यह स्वेद ग्रन्थि से पसीने के स्राव को बढ़ाता है । 

3. यह लार ग्रन्थियों के स्रवण को कम करता है । 

4. वह हृदय स्पन्दन को बढ़ाता है । 

5. यह त्वचीय मधिर वाहिनियों को सिकोड़ता है , जिससे त्वचा पीली हो जाती है और रक्त दाब बढ़ जाता है । यह उन रुधिर वाहिनियों को फैलाता है जो हृदय , मस्तिष्क फेफड़ों तथा कंकालीय पेशियों को संवहनित करती है । 

6. यह एड्रीनल ववण को बढ़ाता है । 

7. यह मूत्राशय की पेशियों को फैलाता है । 

8. यह लैक्राइमल ग्रन्थियों के स्रवण को बढ़ाता है । 

9. यह रक्त में शर्करा के स्तर को बढ़ाता है । 

10. यह आहारनाल के क्रमानुसंकुचन को कम करता है । 

11. यह पाचन ग्रन्थियों के स्रवण को कम करता है । 

12. यह गुदा के स्फिक्टर को सिकोड़ता है । 

13. इसकी क्रिया से बाल खड़े हो जाते हैं । 

14. यह श्वसन दर को तीव्र करता है । 

15. यह रक्त दाब को बढ़ाता है । 

16. यह रुधिर में RBC की संख्या में वृद्धि करता है । 

17. इसके सामूहिक प्रभाव से भय , पीड़ा तथा क्रोध पर प्रभाव पड़ता है । 

परानुकम्पी तत्रिका तंत्र के कार्य 

1. यह आँख की पुतलियों ( Pupil ) को सिकोड़ता है । 

2. यह स्वेद ग्रन्थियों से पसीने के स्राव को घटाता है । 

3. यह लार ग्रन्थियों के स्रवण को बढ़ाता है । 

4. यह हृदय स्पन्दन को घटाता है । 

5. यह सभी रुधिर वाहिनियों को फैलाता है । 

6. यह एड्रीनल स्रवण को कम करता है । 

7. यह मूत्राशय की पेशियों को सिकोड़ता है । 

8. यह लैक्राइमल ग्रन्थियों के स्रवण को कम करता है । 

9. यह रक्त में शर्करा के स्तर को कम करता है । 

10. यह आहारनाल के क्रमानुकुंचन को बढ़ाता है । 

11. यह पाचन ग्रन्थियों के स्रवण को बढ़ाता है ।

12. यह गुदा के स्फिक्टर को फैलाता है । 

13. इसकी क्रिया से बाल ( रोंगटे खड़े नहीं होते हैं । 

14. यह श्वसन दर को कम करता है । 

15. यह रक्त दाब ( Blood pressure ) को कम करता है । 

16. यह रुधिर में RBC की संख्या में कमी करता है । 

17. इस तंत्रिका तंत्र का प्रभाव सामूहिक रूप से आराम एवं सुख की स्थितियाँ उत्पन्न करता है । 

प्रतिवती क्रियाएँ ( Reflex actions ) : इन्हें स्पाइनल प्रतिक्षेप भी कहते हैं । बाह्य उद्दीपनों के प्रति होनेवाली यंत्रवत , तत्काल एवं अविवेचित अनुक्रिया जिसमें मस्तिष्क की कोई भूमिका नहीं होती है , प्रतिवी क्रियाएँ कहलाती हैं । इस प्रकार की क्रियाओं में हम जो कुछ भी करते हैं उनपर विचारों का नियंत्रण नहीं होता है । घुटने का झटका . खाँसना , जम्हाई लेना , पलकों का झपकना , छींक आना , डर से काँपने लगना , खाने की वस्तु देखकर मुँह में पानी आना , ठंड से काँपना , बुरी खबर सुनकर हृदय की धड़कन तेज होना आदि सभी प्रतिवर्ती क्रियाओं के उदाहरण हैं । सामान्यतः ये क्रियाएँ रीढ़ रज्जु या मेरुरज्जु द्वारा नियंत्रित होती है । प्रतिवर्ती क्रिया में उद्दीपनों या संवेदनाओं को त्वचा या अन्य ग्राही अगों से संवेदना मार्ग द्वारा तंत्रिका केन्द्र ( मेरुरज्जु ) में पहुँचा दिया जाता है । यहाँ से संवेदना प्राप्त कर उचित आदेश निर्गत होते हैं । ये आदेश प्रेरक मार्ग से होते हुए फिर अभिवाही अंगों में पहुँचते है जहाँ तंत्रिका तंत्र के आदेशानुसार कार्य होते हैं । आवेग संचरण के सम्पूर्ण पथ को प्रतिवी चाप या रिफ्लेक्स आर्क ( Reflex arc ) कहते हैं । अधिकतर प्रतिवर्तन मेरुरज्जु से सम्बद्ध होते हैं । इसलिए उन्हें मेरु प्रतिवर्तन भी कहते हैं । 

A. रुधिर परिसंचरण तंत्र

 मनुष्य तथा उच्च जन्तुओं ( कशेरुकियों एवं कुछ अकशेरुकियो ) में शरीर के भीतर पदार्थों के परिवहन के लिए एक तंत्र सुविकसित होता है जिसे परिसंचरण तंत्र ( Circulatory system ) कहते हैं । रुधिर एक तरल संयोजी ऊतक है । यही तरल रुधिर पदार्थों के परिवहन या परिसंचरण हेतु एक माध्यम प्रदान करता है । परिसंचरण तंत्र में रुधिर के अतिरिक्त एक केन्द्रीय पम्प अंग होता है . जिसे हृदय ( Heart ) कहते हैं , और रुधिर वाहिनियाँ ( Blood vessels ) होती है । इन्हीं रुधिर वाहिनियों के भीतर रुधिर निरंतर प्रवाहित होता रहता है । 

परिसंचरण तंत्र के कार्य 

1. यह पोषक पदार्थो जैसे — ग्लूकोज . वसीय अम्ल , विटामिन आदि का अवशोषण कर केन्द्र में शरीर के विभिन्न भागों तक परिवहन करता है । 

2. यह नाइट्रोजनी वर्च पदाथों जैसे — अमोनिया यूरिया , यूरिक अम्ल आदि का शरीर के विभिन्न भागों से उत्सर्जी अंगों तक परिवहन करता है । 

3. यह हार्मोन का अन्तःस्रावी ग्रन्धि मे लक्षित अंगों तक परिवहन करता है । 

4. यह फेफड़ों से शरीर की कोशिकाओं एवं ऊतकों तक ऑक्सीजन का परिवहन करता है । 

रुधिर परिसंचरण तंत्र के अवयव ( Elements of blood circulatory system ) : रुधिर परिसंचरण तंत्र मुख्यतः तीन अवयवों का बना होता है । 

1.हृदय ( Heart ) : यह मोटा , पेशीय व रुधिर को शरीर में प्रवाहित करने वाला अंग है । 

2. रुधिर नलिकाएँ ( Blood Vessels ) : रुधिर नलिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं 

( a ) धमनियाँ ( Arteries ) : मोटी पेशीय तथा लचीली भित्तियुक्त वे रुधिर नलिकाएँ जो रुधिर को हृदय से विभिन्न अंगों में पहुँचाती हैं , धमनियाँ कहलाती हैं । ये शरीर में गहराई में स्थित होते हैं तथा इनमें कोई कपाट ( Valve ) नहीं पाया जाता है । फुफ्फुस धमनी ( Pulmonary artery ) के अतिरिक्त सभी धमनियों में ऑक्सीकृत रुधिर ( शुद्ध रुधिर ) प्रवाहित होता है । धमनियों में रुधिर अधिक दाब से अधिक गति से बहता है । धमनियों की गुहा ( Lumen ) छोटी होती है तथा इनकी भित्तियाँ न पिचकने वाली होती हैं । धमनियों के ट्यूनिका मीडिया ( मध्य स्तर ) में अधिक पेशी तन्तु पाये जाते हैं । जन्तु की मृत्यु के बाद धमनियाँ खाली हो जाती हैं । धमनियाँ रुधिर को बाँटती है । 

( b ) शिराएँ ( Veins ) : ये पतली तथा कम लचीली भित्ति बाली रुधिर नलिकाएँ हैं जो विभिन्न अंगों से रुधिर को हृदय तक ले जाते हैं । ये शरीर में अधिक गहराई में नहीं होती हैं । इनमें रुधिर की विपरीत गति को रोकने हेतु कपाट ( Valve ) पाये जाते हैं । इनमें रुधिर कम दाब एवं कम गति से बहता है । फुफ्फुस शिरा के अतिरिक्त सभी शिराओं में अनॉक्सीकृत रुधिर ( अशुद्ध रुधिर ) प्रवाहित होता है । शिराओं की गुहा ( Lumen ) बड़ी होती है । इनकी भित्तियाँ पिचकने वाली होती है । शिराओं के ट्यूनिका मीडिया ( मध्य स्तर ) में अपेक्षाकृत कम पेशी तन्तु पाये जाते हैं । जन्तु की मृत्यु के बाद भी इनमें रुधिर रहता है । शिराएँ रुधिर को एकत्रित करने का कार्य करती है ।

( c ) रुधिर बाहिनियाँ ( Blood capillaries ) : ये सबसे पतली रुधिर नलिकाएँ हैं जो धमनियों को शिराओं से जोड़ती हैं । प्रत्येक वाहिनी चपटी कोशिकाओं की एक परत से बनी होती है । ये पोषक पदाधों , वर्त्य पदार्थों , गैस आदि पदार्थों को रुधिर एवं कोशिका के बीच आदान प्रदान करने में सहायक होता है । 

3. रुधिर ( Blood ) : यह तरल , संवहनी ( Vascular ) संयोजी ऊतक है जिसमें रुधिर कणिकाएँ , प्लाज्मा हीमोग्लोबिन , प्लाज्मा प्रोटीन आदि उपस्थित होती है । 

रुधिर परिसंचरण तंत्र के प्रकार : रुधिर परिसंचरण तंत्र दो प्रकार के होते हैं -

( A ) खुला परिसंचरण तंत्र ( Open circulatory system ) : इस प्रकार के परिसंचरण तंत्र में रुधिर कुछ समय के लिए रुधिर नलिकाओं में उपस्थित रहता है तथा अंत में रुधिर नलिकाओं से खुले स्थान में आ जाता है । इस प्रकार का रुधिर परिसंचरण तिलचट्टा , प्रॉन , कीट , मकड़ी आदि में पाया जाता है । इस प्रकार के रुधिर परिसंचरण तंत्र में रुधिर कम दाब तथा कम गति से बहता है । इस प्रकार के रुधिर परिसंचरण तंत्र में रुधिर परिसंचरण चक्र कम समय में पूर्ण हो जाता है । जैसे - तिलचट्टे में रुधिर परिसंचरण चक्र केवल 5 से 6 मिनट में पूर्ण हो जाता है । 

( B ) बन्द परिसंचरण तंत्र ( Closed circulatory system ) : इस प्रकार के परिसंचरण तंत्र में रुधिर बन्द नलिकाओं में बहता है । इसमें रुधिर अधिक दाब एवं अधिक गति से बहता है । इसमें पदार्थों का आदान - प्रदान ऊतक द्रव ( Tissue Fluid ) द्वारा होता है । इस प्रकार का परिसंचरण तंत्र सभी कशेरुकियों में पाया जाता है । 

मनुष्य में विकसित बन्द तथा दोहरा परिसंचरण तंत्र पाया जाता है । मनुष्य का रुधिर परिसंचरण तंत्र दो भागों से मिलकर बना होता है ! ये हैं- A. रुधिर परिसंचरण तंत्र ( Blood circulatory system ) B. लसीका परिसंचरण तंत्र ( Lymph circulatory system ) | 

A. रुधिर परिसंचरण तंत्र ( Blood circulatory System ) : मनुष्य में रुधिर परिसंचरण तंत्र की खोज विलियम हार्वे ( William Harvey ) ने की थी । इस तंत्र में मुख्य संवहनी पदार्थ रुधिर या रक्त होता है । रुधिर परिसंचरण तंत्र के भाग - रुधिर परिसंचरण तंत्र के तीन मुख्य भाग हैं


 

1. हृदय ( Heart ) : यह केन्द्रीय पम्प अंग है जो सम्पूर्ण शरीर में रुधिर का परिसंचरण करता है । मनुष्य का हृदय एक मांसल , शंक्वाकार ( Conical ) अंग है । यह पसलियों के नीचे और फेफड़ों के बीच में स्थित होता है । हृदय झिल्ली की बनी एक थैली के भीतर रहता है जिसे हृदयावरण या पेरीकार्डियम ( Pericardium ) कहते हैं । इसमें एक द्रव भरा रहता है जिसे पेरीकार्डियल द्रव ( Pericardial fluid ) कहते हैं । यह द्रव हृदय को बाहरी आघातों से बचाता है । मनुष्य के हृदय में चार कोष्ठक ( Chambers ) होते हैं जो दायाँ और बायाँ अलिंद ( Right and left Auricle ) तथा दायाँ और बायों निलय ( Rightand left ventricle ) कहलाते हैं । दायाँ और बायाँ अलिंद हृदय के चौड़े अग्रभाग में होते हैं तथा ये दोनों एक विभाजिका या सेप्टम ( Septum ) के द्वारा एक - दूसरे से अलग होते हैं । इस विभाजिका को अंतराअलिंद भित्ति ( Interauricular septum ) कहते है । दायाँ और बायाँ निलय हृदय के सँकरे पश्च भाग में स्थित होते हैं तथा ये दोनों एक दूसरे से अंतरानिलय भित्ति ( Interventricular sepptem ) के द्वारा अलग होते हैं । दोनों अलिंद की दीवार पतली होती है जबकि निलय की दीवार इनके अपेक्षाकृत मोटी होती हैं । बाएँ निलय की दीवार दाएँ निलय की दीवार की अपेक्षा तिगुनी या चौगुनी मोटी होती है । दायाँ अलिंद दाएँ निलय में एक छिद्र के द्वारा खुलता है जिसे दायाँ अलिद निलय छिद्र ( Right auriculoventricular aperture ) कहते हैं । एक छिद्र पर एक त्रिदली कपाट ( Tricuspid valve ) पाया जाता है जो रक्त को दाएँ अलिंद से दाएँ निलय में जाने तो देता है लेकिन बापस नहीं आने देता है । इसी प्रकार बायाँ अलिंद बाएँ निलय में बायाँ अलिंद निलय छिद्र ( Left auriculoventricular aperture ) के द्वारा खुलता है । इस छिद्र पर एक द्विदली कपाट ( Bicuspid valve ) या मिट्रल कपाट ( Mitral talve ) होता है जो रक्त को बाएँ अलिंद से बाएँ निलय में जाने तो देता है किन्तु विपरीत दिशा में वापस आने नहीं देता है । दाएँ निलच के अगले भाग की बाई ओर से एक बड़ी फुफ्फुस चाप ( Pulmonary arch ) निकलती है | फुफ्फुम चाय के निकलने के स्थान पर तीन अर्द्धचन्द्राकार वाल्व ( Semilunar valve ) स्थित होते हैं । इस वाल्व के कारण अधिर दाएँ निलय से फुफ्फुस चाप में जाता तो है , परन्तु फिर वापस नहीं आ सकता । फुफ्फुस चाप आगे की ओर दाई और बाई फुफ्फुस धमनियों ( Right and left pulmonary arteries ) में बँट जाता है , जो रुधिर को फेफड़ों में ले जाते हैं । बाएँ निलय के अगले भाग के दाएँ कोने से महाधमनी ( Aorta ) या महाधमनी चाप ( Aorticarch ) निकलता है । इस महाधमनी के उद्गम स्थान पर भी तीन अर्द्धचन्द्राकार वाल्व ( Semilunar valve ) होते हैं जो रुधिर को बाएं निलय से महाधमनी की ओर ही प्रवाहित होने देते हैं । शरीर के सभी भागों ( फेफड़ों को छोड़कर ) में जाने वाली धमनियों महाधमनी चाप से ही निकलती हैं । दाएँ अलिंद में दो अन महाशिराएँ ( Precaval veins ) तथा एक पश्च महाशिरा ( Postcaval veins ) खुलती है , जो शरीर के सभी भागों से अशुद्ध रुधिर दाएँ अलिंद में लाती है । बाएँ अलिद में फुफ्फुस शिराएँ ( Pulmonary veins ) खुलती हैं , जो फेफड़ों से शुद्ध रुधिर बाएँ अलिंद में लाती है ।

हृदय की क्रियाविधि ( Mechanism of heart ) : शरीर में रुधिर का परिसंचरण हृदय की पम्प क्रिया द्वारा सम्पन्न होता है । हृदय के कार्य करने की दो अवस्थाएँ हैं । प्रथम अवस्था को प्रकुंचन ( Systole ) कहते हैं जिसमें निलय सिकुड़ते हैं और उनमें भरे रुधिर को महाधमनियों में पम्प करते हैं । द्वितीय अवस्था को अनुशिथिलन ( Diastole ) कहते हैं , जिसमें निलय फैलते हैं और अलिंद से रुधिर प्राप्त करते हैं । एक प्रकुंचन ( Systole ) तथा एक अनुशिथिलन ( Diastole ) मिलकर हृदय - धड़कन ( Heart beat ) का निर्माण करते हैं । एक सामान्य था स्वस्थ मनुष्य का हृदय विश्राम की अवस्था में औसतन 1 मिनट में 72 बार धड़कता है , परन्तु कड़ी मेहनत या व्यायाम के फलस्वरूप यह धड़कन बढ़कर 1 मिनट में 180 बार तक हो सकती है । हृदय एक धड़कन में लगभग 70 मिमी . रुधिर पम्प करता है । रुधिर के इस आयतन को स्ट्रीक आयतन कहते हैं । हृदय की धड़कन के समय दोनों अलिंद एक साथ संकुचित होते हैं और फिर दोनों निलय एक साथ संकुचित होते हैं । हृदय की धड़कन दाहिने अलिंद के ऊपरी भाग में स्थित ऊतकों के एक समूह से शुरू होती है जिसे शिरा अलिंद नोड ( Sinuauricular node ) कहते हैं । इसे ही पेसमेकर ( Pacemaker ) के नाम से जाना जाता है । हृदय के भीतर संकुचन एवं अनुशिथिलन के आवेग ( Impulse ) का प्रसारण विद्युत रासायनिक तरंग के रूप में होता है , जो शिरा - अलिंद नोड ( SAN ) से प्रारम्भ होकर निलयों तक जाती है । इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम ( Electrocardiogram ) नामक उपकरण द्वारा हृदय की धड़कन के दौरान वैद्युत परिवर्तन रिकॉर्ड किए जा सकते हैं । इस ग्राफीय रिकार्डिंग को इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफी ( Electrocardiography ) अथवा ECG कहते हैं । 

हृदय का स्पन्दन ( Heart beat ) : हृदय के क्रमिक या नियमित संकुचन को हृदय स्पन्दन कहते हैं । मनुष्य में हृदय सामान्यतः 72 बार प्रति मिनट स्पन्दन होता है जिसमें लगभग 5 लीटर रुधिर का पम्पिंग होता है । सर्वप्रथम दाएँ एवं तुरन्त बाद बाएँ अलिंद में संकुचन होता है जिसके कारण रुधिर अलिन्दों से निलयों में पम्प हो जाता है । दाएँ एवं बाएँ निलयों में एक साथ तीव्र आकुंचन होता है और निलयों का रुधिर धमनियों में चला जाता है । 

हृदय की धड़कन का नियमन ( Regulation of heart beat ) : हृदय की धड़कन एक स्वचालित क्रिया है जो शिरा अलिंद नोड ( Simu auricular node ) से प्रारम्भ होती है । यह क्रिया पश्च मस्तिष्क ( Rhombencephalon ) के मेडुला ऑब्लांगाटा में उपस्थित एक नियंत्रण केन्द्र के नियंत्रण में होती है । इस केन्द्र को कार्डियक केन्द्र ( Cardiac centre ) कहते हैं । हार्मोन्स में थाइरॉक्सिन ( Thymxine ) एवं एड्रिनेलिन ( Adrenalin ) स्वतंत्र रूप से हृदय की धड़कन को नियंत्रित करते हैं । तंत्रिकीय एवं हार्मोनल नियमन के अलावा शरीर में उपस्थित कुछ रासायनिक पदार्थ भी हृदय की गति को नियंत्रित करते हैं । रुधिर में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड ( CO . ) रुधिर के pH को कम करके हृदय की गति को बढ़ाती है । अतः अम्लीयता ( Acidity ) हृदय की गति को अधिक तथा क्षारीयता हृदय की गति को कम करती है ।

2. रुधिर वाहिकाएँ या रुधिर वाहिनियों ( blood vessels ) : मानव शरीर में रुधिर का संचरण धमनियों ( Arteries ) एवं शिराओं ( Veins ) के द्वारा होता है तथा रुधिर कोशिकाएँ ( Blood capilaries ) धमनियों एवं शिराओं को जोड़ती है 

( a ) धमनियाँ ( Arteries ) : जो रुधिर बाहिनियों हृदय से रुधिर को शरीर के विभिन्न अंगों तक ले जाती है , उन्हें धमनियाँ ( Arteries ) कहते हैं । इनमें सामान्यतः शुद्ध रुधिर या ऑक्सीजनित रुधिर ( Pure blood orOxygenated blood ) प्रवाहित होता है सिवाय फुफ्फुसीय धमनी के जिसमें अशुद्ध रुधिर या विऑक्सीजनित रुधिर ( Impure blood or Deoxygenated blood ) प्रवाहित होता है । धमनियों की दीवारें अपेक्षाकृत मोटी . पेशीय तथा लचीली होती हैं । इस कारण धमनियाँ सिकुड़ और फैल सकती हैं तथा इनमें काफी दाब ( Pressure ) के सहन करने की क्षमता होती है । जब हृदय रुधिर को धमनियों में पम्प करता है , उस समय दाब काफी उच्च होता है । अतः धमनियों में रुधिर परिसंचरण झटके से तथा तेजी से होता है । 

( b ) शिराएँ ( Veins ) : वे रुधिर वाहिनियाँ जो शरीर के विभिन्न अंगों से रुधिर को हृदय की ओर वापस लौटाती है , शिराएँ कहलाती हैं । इनकी भित्ति पतली होती है । इनकी दीवारों में अपेक्षाकृत कम पेशीय होती है । इनकी आंतरिक गुहा अपेक्षाकृत काफी चौड़ी होती है । अधिकांश शिराओं में नव चन्द्राकार कपाट होते हैं जो रुधिर को वापस विपरीत दिशा में लौटने नहीं देते । शिराएँ नीले रंग की प्रतीत होती हैं । त्वचा में उपस्थित पीले वर्णक ( Pigment ) के कारण शिराओं में बहने वाले गाढ़े लाल रंग का रुधिर नीला प्रतीत होता है । शिराओं में सामान्यतः अशुद्ध या कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रुधिर ( Immpure blood ) बहता है सिवाय फुफ्फुस शिरा ( Pulmonary vein ) के जिसमें शुद्ध रुधिर या ऑक्सीजन युक्त रुधिर बहता है ।

 घमनी तथा शिरा में अंतर

 धमनी ( Artery )  

 1. ये रुधिर को हृदय से अंगों की ओर ले जाती है ।  

 2. यह लाल रंग की होती है ।

 3. इसमें कपाट ( Valve ) नहीं पाये हैं ।

 4. यह शरीर में गहराई में स्थित होती है ।

 5. इसकी दीवारें मोटी तथा पेशीय होती हैं । 

 6. इसकी आंतरिक गुहा सँकरी होती है । 

 7. यह खाली होने पर पिचकती नहीं है । 

 8. पल्मोनरी शिरा को छोड़कर सभी धमनियों में ऑक्सीजन युक्त रुधिर बहता है । 

 शिरा ( Vein )

1 ये रुधिर को अंगों से हृदय में  लाती है ।

2. यह गहरे लाल या नीले बैंगनी रंग की होती है ।

3. इसमें कपाट ( Valve ) पाये जाते जाते हैं ।

4. यह शरीर की ऊपरी सतह में स्थित होती है ।

5. इसकी दीवारें पतली तथा लचीली होती है ।

6. इसकी आंतरिक गुहा अपेक्षाकृत काफी चौड़ी होती है । 

7. यह खाली होने पर पिचक जाती है । 

8. पल्मोनरी धमनी को छोड़कर सभी शिराओं में कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रुधिर बहता है 

( c ) रुधिर केशिकाएँ ( Blood capillaries ) : रुधिर केशिकाएं बहुत ही महीन रुधिर वाहिनियाँ होती हैं । इनकी भित्ति की मोटाई केवल एक कोशिकीय स्तर की होती है । इनका व्यास लाल रुधिर कोशिकाओं से बहुत थोड़ा ही अधिक होता है । इस कारण लाल रुधिर कोशिकाएँ इसके भीतर केवल एक पंक्ति में व्यवस्थित होकर ही गुजर सकती है । 

रुधिर केशिकाओं का निर्माण ( Formation of blood capillaries ) : धमनियाँ शाखाओं में बँटी होती है , जिन्हें धमनिकाएँ ( Arterioles ) कहते हैं । ये विभिन्न ऊतकों में प्रवेश कर महीन शाखाओं में विभाजित होकर केशिकाएँ ( Capillaries ) बनाती हैं । ये केशिकाएँ फिर संयोजित होकर शिरिकाओं ( Venules ) का निर्माण करती हैं और शिरिकाएँ संयोजित होकर शिराओं ( Veins ) का । ऊतकों में विभिन्न पदार्थों जैसे — भोजन , O2 , CO2, आदि के विसरण द्वारा आदान - प्रदान इन रुधिर केशिकाओं द्वारा ही होता है । बहुत से अर्थों में , सम्पूर्ण शरीर में फैले रुधिर केशिकाओं के जाल रुधिर परिसंचरण के सबसे महत्वपूर्ण भाग होते हैं , क्योंकि वहीं पर रुधिर और ऊतक की कोशिकाओं के बीच पदार्थों का आदान प्रदान होता है ।

रुधिरदाब या रक्तचाप ( Blood pressure ) : हृदय के संकुचन से धमनियों की दीवारों पर पड़ने वाला दाब रुधिर दाब ( Blood pressure ) कहलाता है । इस दाब को संकुचन दाब ( Systolic Pressure ) कहते हैं जो निलयों के संकुचन के फलस्वरूप उत्पन्न होता है । यह संकुचन दाब उतना होता है , जितना कि 120 मिलीमीटर पारे के स्तम्भ द्वारा उत्पन्न होता है । इसके ठीक विपरीत अनुशिथिलन दाब ( Diastolic Pressure ) होता है जो निलय के अनुशिथिलन के फलस्वरूप उत्पन्न होता है , जब रुधिर अलिंद ( Auricle ) से निलय ( Ventricle ) में प्रवेश कर रहा होता है । यह दाब सामान्यतः 80 मिलीमीटर पारे के स्तम्भ द्वारा उत्पन्न दाब के बराबर होता है । अतः एक स्वस्थ मनुष्य में संकुचन और अनुशिथिलन दाब अर्थात् रुधिर दाब 120/80 होता है । विभिन्न व्यक्तियों में रुधिर दाब उम्र , लिंग , आनुवंशिकता , शारीरिक एवं मानसिक स्थिति तथा अन्य कई कारणों से अलग अलग होता है । रुधिर दाब की माप एक विशेष उपकरण द्वारा की जाती है । वह उपकरण स्फिगमोमैनोमीटर ( Sphygmomanometer ) कहलाता है । यदि कोई व्यक्ति लगातार उच्च रुधिर दाब ( 150 / 90mm Hg ) से पीड़ित है , तो यह अवस्था हाइपरटेंशन ( Hypertension ) कहलाती है । उच्च रुधिर दाब के लिए अधिक भोजन , भय , चिन्ता . दुःख आदि कारक उत्तरदायी होते हैं । हाइपरटेंशन की अवस्था में कभी - कभी रक्तवाहिनियाँ फट जाती हैं , जिनसे आन्तरिक रक्तस्राव ( Internal bleeding ) होने लगता है । इसके कारण कभी - कभी हृदयाघाट ( Heart stroke ) भी हो जाता है । हाइपरटेंशन के कारण जब मस्तिष्क की रक्त कोशिकाएँ फट जाती हैं तब मस्तिष्क को रक्त और उसके साथ ऑक्सीजन तथा पोषण उचित मात्रा में नहीं मिल पाता है । इससे मस्तिष्क सामान्य रूप से काम करना बंद कर देता है । यदि कोई व्यक्ति लगातार निम्न रुधिर दाब ( 100/50 mmHg ) से पीड़ित है , तो यह अवस्था हाइपोटेंशन ( Hypotension ) कहलाती है । हाइपोटेंशन में हृदय की संकुचन अवस्था और तीव्रता दोनों में कमी आ जाती है । धमनियाँ फैल जाती हैं और रक्त की कमी हो जाती है । यही कारण है कि रक्त का दाब कम हो जाता है । रुधिर दाब को सर्वप्रथम एस हेल्स ने 1733 ई . में घोड़े में मापा था ।

B. लसीका परिसंचरण तंत्र 

लसीका ( Lymph ) : कोशिकाओं के चारों ओर द्रव को एक पतली परत होती है , जिसे ऊतक द्रव ( Tissue fluid ) कहते हैं । रुधिर एवं कोशिकाओं के मध्य होने वाले पदाधों का आदान - प्रदान इसी ऊतक द्रव के माध्यम से होता है । वास्तव में रुधिर कोशिकाओं से पदार्थ जैसे — भोजन , ऑक्सीजन आदि सबसे पहले इसी ऊतक द्रव में हो विसरित होते हैं और तब ऊतक द्रव से कोशिकाओं में । इसी प्रकार कोशिकाओं से पदार्थ जैसे- co , यूरिया आदि पहले इसी ऊतक - द्रव में विसरित होते हैं , फिर इस द्रव से रुधिर कोशिकाओं में । यह ऊतक द्रव वाहिनियों में एकत्रित होता है । वाहिनियों में एकत्रित होने के बाद इसे लसीका कहते हैं । लसीका जिस वाहिनी में एकत्रित होता है उसे लसीका वाहिनी ( Lymph Vessel ) कहते हैं । लसीका हल्के पीले रंग का द्रव है । रुधिर की तरह यह लाल रंग का नहीं होता है क्योंकि इसमें लाल वर्णक हीमोग्लोबिन उपस्थित नहीं होता है । इसका रासायनिक संघटन प्लाज्मा ( Plasma ) की भाँति होता है जिसमें विशेष प्रकार की श्वेत कोशिकाएँ होती हैं , जिन्हें लिम्फोसाइट ( Lymphocytes ) कहते हैं । छोटी - छोटी महीन लसीका बाहिनियाँ संयोजित होकर बड़ी लसीका वाहिनियों बनाती हैं , उसी प्रकार जिस प्रकार रुधिर केशिकाएँ मिलकर शिरिकाओं ( Venules ) का निर्माण करती है । लसीका वाहिनियों अन्ततोगल्या मिलकर वक्षीय वाहिनी ( Thoracic duct ) तथा दाहिनी लसीका वाहिनी ( Right lymphatic duct ) बनाती है , जो हृदय के निकट शिरातंत्र में खुलती है । लसीका प्रवाह केवल एक ही दिशा में अर्थात् ऊतकों से हृदय की ओर होता है । 

लसीका वाहिनियों कहीं - कहीं पर फुलकर गाँठे बनाती हैं जिनको लसीका गाँठे ( Lymphnodes ) कहते हैं । ये गाँठे डोरी ( Strings ) में मनकों की भाँति प्रतीत होते हैं । मनुष्य के गर्दन ( Neck ) , बाहुकक्षों ( Arrm pits ) आदि में सबसे अधिक संख्या में लसीका गाँठे मौजूद होती हैं । मनुष्य के गले में गल तुण्डिका या टॉन्सिल ( Tonsils ) भी लसीका ऊतकों के पिण्ड हैं ।

लसीका के कार्यः लसीका के निम्नलिखित प्रमुख कार्य होते हैं 

1.जल का अस्थायी संचय ( Temporary storage of water ) : शरीर में प्रवेश करने वाले जल के लिए , लसीका वाहिनियाँ अस्थायी आशय ( Reservoir ) का कार्य करती हैं । 

2. अधिशेष जल का अवशोषण ( Absorption of excess of water ) : ऊतक द्रव से जल की अधिशेष मात्रा को हटाकर लसीका उसे रुधिर परिसंचरण में डालती है । 

3.दीर्घाणुओं का परिवहन ( Transport of macromolecules ) : लसीका द्वारा बड़े बड़े अणुओं जैसे — प्रोटीन , हार्मोन आदि को रुधिर परिसंचरण में ले जाकर डाला जाता है क्योंकि ये अणु रुधिर केशिकाओं की भित्तियों को नहीं भेद पाते । अतः ये अणु सीधे रुधिर परिसंचरण में नहीं पहुंच पाते । 

4. वसा का परिवहन ( Transport of fat ) : वसा का परिवहन लसीका के द्वारा ही होता है । आहारनाल में वसा के पाचन के पश्चात वसा अम्ल एवं ग्लिसरॉल रुधिर वाहिनियों में न जाकर लैक्टीवल में आते हैं और वहाँ से लसीका तंत्र में । 

5.संक्रमण से सुरक्षा ( Protection from infection ) : लसीका में मौजूद लिम्फोसाइट्स रोगाणुओं को नष्ट कर संक्रमण से मनुष्य की सुरक्षा करते हैं । 

सीका एवं रुधिर में अन्तर ( Difference between lymph and blood )

लसीका  

1. लसीका द्रव रंगहीन होता है । 

2. रुधिर में लाल रुधिर कणिकाएँ ( RBCs ) कम संख्या में होती हैं । 

3. रुधिर में श्वेत रुधिर कणिकाएँ ( WBCG ) अधिक संख्या में होती  है ।

4. लसीका में फाइब्रिनोजेन ( Fibrinogen ) की मात्रा कम होती है . फिर भी थक्का जमने की शक्ति इसमें निहित होती है । होती है

रुधिर

1.रुधिर का रंग लाल होता है । 

2. लसीका में लाल रुधिर कणिकाएँ ( RBCs ) अधिक संख्या में होती हैं ।

3. लसीका में श्वेत रुधिर कणिकाएँ ( WBCs ) लसीका के अनुपात में कम संख्या में होती है । 

4. रुधिर में फाइब्रिनोजेन (Fibrinogen )   की मात्रा अधिक है .  जिससे यह आसानी के  साथ थक्का बन जाता है । 

Post a Comment

if you have any doubts. please let me know