बिन्दुसार : 298 ई . पू . - 273 ई . पू . 

अधिकांश धार्मिक ग्रंथों जैसे - पुराण , दीपवंश , महावंश , सिंहली कथायें आदि में चंद्रगुप्त मौर्य के उत्तराधिकारी का नाम बिन्दुसार मिलता है । बिन्दुसार के अन्य नाम मिलते हैं - बिन्दुपाल ( चीनी ग्रंथ ' फा - युएन - चु - लिन ' ) , सिहसेन ( जैन ग्रंथ ) , भद्रसार ( वायु पुराण ) , अमित्रोकैडीज / अमित्रोजेडस / अलित्रोचडस ( यूनानी ग्रंथ ) । विद्वानों का मत है कि अमित्रोकेडीज संस्कृत शब्द अमित्रघात ( अर्थात् शत्रुओं का नाश करनेवाला ) का यूनानी रूपांतर है और यह बिन्दुसार की उपाधि थी । 

बिन्दुसार की महानता इस तथ्य में निहित है कि उसने अपने पिता से जिस विस्तृत साम्राज्य को उत्तराधिकार में पाया था उसे अक्षुण्ण बनाये रखा ।

केवल कलिंग ( उड़ीशा ) और सुदूर दक्षिण के राज्य ही बिन्दुसार के साम्राज्य से बाहर था । इस सुदूर दक्षिणी राज्यों के साथ बिन्दुसार की मैत्री थी इसी कारण बिन्दुसार ने इसे जीतना जरूरी नहीं समझा । 

तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ के अनुसार ' चंद्रगुप्त के पश्चात चाणक्य बिन्दुसार का भी प्रधानमंत्री बना रहा । चाणक्य ने 16 राज्यों के राजाओं और सामंतों का विनाश किया और बिन्दुसार को पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्रपर्यंत भू - भाग का अधीश ( दो समुद्रों की बीच की भूमि का विजेता ) बनाया । ' संभवतः चंद्रगुप्त मौर्य के राज्य परित्याग के बाद कुछ शासकों ने विद्रोह किया , जिसे बिन्दुसार ने चाणक्य की सहायता से दबा दिया ।

 तक्षशिला विद्रोहः बिन्दुसार ने अपने बड़े पुत्र सुसीम ( सुमन ) को तक्षशिला का तथा द्वितीय पुत्र अशोक को उज्जयिनी का गवर्नर बनाया था । जब उत्तरापथ की राजधानी तक्षशिला में विद्रोह हुआ तो उसके गवर्नर सुसीम ने विद्रोह का दमन करने की कोशिश की । लेकिन जब यह विद्रोह सुसीम के नियंत्रण से बाहर हो गया तो बिन्दुसार ने यहाँ शासन - व्यवस्था स्थापित करने के लिए अशोक को भेजा । अशोक के तक्षशिला पहुँचने पर तक्षशिलावासियों ने अशोक का स्वागत इन शब्दों के साथ किया : " हमलोग न तो कुमारामात्य ( सुसीम ) के विरुद्ध हैं और न ही राजा बिन्दुसार के । हम तो उन दुष्ट आमात्यों ( मंत्रियों ) का विरोध करते हैं जिन्होंने हमें परेशान कर रखा है । " अशोक ने जनता के रोष को बिना शस्त्र प्रयोग के शांत कर दिया तथा विद्रोह का अंत हो गया । 

यूनानी शासकों से संबंध : बिन्दुसार के समय में भी भारत का पश्चिमी यूनानी राज्यों के साथ मैत्री संबंध कायम रहा । यूनानी लेखक एथेनियस ने बिन्दुसार एवं एण्टियोकस- I ( सेल्यूकस निकेटर का उत्तराधिकारी व सीरिया का तत्कालीन शासक ) के बीच एक मैत्रीपूर्ण पत्र - व्यवहार का विवरण दिया है , जिसमें भारतीय शासक ने सीरियाई शासक से तीन वस्तुओं की माँग की थी - मीठी शराब , सूखी अंजीर एवं दार्शनिक ( Sophist ) । सीरियाई शासक ने प्रथम दो वस्तुएँ भिजवा दी , किन्तु तीसरी वस्तु अर्थात् दार्शनिक के संबंध में यह कहला भेजा कि यूनानी कानूनों के अनुसार दार्शनिकों का विक्रय नही किया जा सकता । स्ट्रैबो के अनुसार सीरियाई शासक ने डायमेकस को अपना राजदूत बनाकर बिन्दुसार के दरबार में भेजा । यह मेगास्थनीज के स्थान पर आया था । प्लिनी के अनुसार मिस्र के तत्कालीन शासक फिलाडेल्फस ( टॉलेमी- II ) ने डायोनिसस को अपना राजदूत बनाकर बिन्दसार के दरबार में भेजा ।
प्रशासन : प्रशासन के क्षेत्र में बिन्दुसार ने अपने पिता चंद्रगुप्त मौर्य का ही अनुगमन किया । अपने साम्राज्य को उसने प्रांतों में विभाजित किया तथा प्रत्येक प्रांत में कुमार ( उपराजा ) नियुक्त किये । बिन्दुसार की सभा में 500 सदस्यों वाली एक मंत्रिपरिषद् भी थी जिसका प्रधान खल्लाटक था । वह चाणक्य के बाद मंत्रिपरिषद् का प्रधान हुआ । - 
धर्मः अपने पिता की तरह बिन्दुसार भी धार्मिक मामलों में गहरी दिलचस्पी लेता था । वह आजीवकों से अत्यंत प्रभावित था । इन्हें वह संरक्षण प्रदान करता था । आजीवक परिव्राजक उसके दरबार की शोभा बढ़ाते थे । 
बिन्दुसार ने 25 वर्षों तक शासन किया । 
बिन्दुसार की मृत्यु 273 ई . पू . में हुई । 

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