चंद्रगुप्त मौर्य : 322 ई . पू . - 298 ई .

चंद्रगुप्त मौर्य मौर्य वंश का संस्थापक था । इस वंश की राजधानी पाटलिपुत्र ( आज का पटना , बिहार ) थी । स्ट्रैबो के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य का एक उपनाम पालिब्रोयस ' ( अर्थात् पाटलिपुत्रक ) था ।

प्रारंभिक जीवन : चंद्रगुप्त मौर्य के प्रारंभिक जीवन के लिए बौद्ध ग्रंथ ही मुख्य स्रोत हैं । बौद्ध ग्रंथों के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य का पिता मोरियनगर का प्रमुख था । जब वह अपनी माता के गर्भ में था तभी उसके पिता सीमावर्ती युद्ध में मारे गये । उसकी माता अपने भाइयों द्वारा पाटलिपुत्र में सुरक्षा की दृष्टि से पहुँचा दी गई । यहीं चंद्रगुप्त का जन्म हुआ । जन्म के साथ ही वह एक गोपालक को समर्पित कर दिया गया । गोपालक ने गोशाला में अपने पुत्र की भाँति उसका लालन - पालन किया । कुछ बड़ा होने पर गोपालक ने उसे एक शिकारी के हाथों बेच दिया । अब वह शिकारी के यहाँ पलने लगा । वह प्रतिभासंपन्न था इसलिए शीघ्र ही उसने अपने हमउम्र बालकों में प्रमुखता हासिल कर ली । वह बालकों की मंडली का राजा बनकर आपसी झगड़ों का निपटारा किया करता था । एक दिन जब वह ' राजकीलम् ' खेल ( राजकीय खेल ) में मगन था , चाणक्य उधर से जा निकला । अपनी सूक्ष्म दृष्टि से चाणक्य ने इस बालक के भावी गुणों का अनुमान लगा लिया । उसने शिकारी को 1,000 कार्षापण देकर चंद्रगुप्त को खरीद लिया । तत्पश्चात् चाणक्य चंद्रगुप्त को तक्षशिला ले गया जहाँ उसने चंद्रगुप्त को सभी विद्याओं में निपुण बनाया ।

विजय अभियान : सामान्यतः चंद्रगुप्त मौर्य की विजयों का क्रम इस प्रकार माना जाता है -1 . पंजाब - सिंध पर विजय 2. मगध पर विजय 3. सेल्यूकस से संघर्ष एवं संधि 4. पश्चिमी भारत की विजय 5. दक्षिणी भारत की विजय ।

1. पंजाब - सिंघ पर विजय चंद्रगुप्त मौर्य ने सर्वप्रथम मगध पर आक्रमण किया किन्तु उसे सफलता नहीं मिली । नतीजतन चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य को मगध से भागना पड़ा । मगध से भागकर चंद्रगुप्त मौर्य चाणक्य के साथ पंजाब पहुँचा । उन दिनों सिकंदर महान पंजाब के राज्यों को जीत रहा था । ऐसा कहा जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य सिकंदर से मिला तथा उसे मगध पर आक्रमण करने के लिए अनुरोध किया क्योंकि उसने मन ही मन सोच रखा था कि यदि सिकंदर मगध को जीत ले और भारत से वापस चला जाये तो नंद राज्य पर अधिकार जमा लूँ । इस विचार से चंद्रगुप्त सिकन्दर से मिला था किन्तु उसकी बातों से सिकन्दर चिढ़ गया और चन्द्रगुप्त को मार डालने का हुक्म दिया । पर चंद्रगुप्त मौर्य किसी प्रकार उसके चंगुल से निकल भागा । सिकंदर के साथ इस प्रवास काल में चंद्रगुप्त ने यूनानी युद्ध कला को नजदीक से देखा और सीखा । प्लूटार्क ने लिखा है : " युवावस्था में एण्ड्रोकोट्स ( अर्थात् चंद्रगुप्त ) सिकंदर से मिला था । " जस्टिन ने भी ' एपिटोम ' ( Epitome ) में इस बात का उल्लेख किया है । सिकंदर के भारत से वापस जाने के उपरांत चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य ने पंजाब की जनता को यूनानियों के विरुद्ध भड़काया और पंजाब - सिंध से यूनानियों को भगाकर चंद्रगुप्त मौर्य स्वयं उन क्षेत्रों का स्वामी बन गया । जस्टिन ने लिखा है : सिकंदर की मृत्यु के बाद भारत ने अपनी गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंका और अनेक यूनानी गवर्नरों की हत्या कर डाली । यूनानी शासक के विरुद्ध इस मुक्ति युद्ध का नायक सैंड्रोकोट्स ( अर्थात् चंद्रगुप्त ) था । " जस्टिन ने चंद्रगुप्त की सेना को डाकुओं का गिरोह ' ( A band of robbers ) कहा है सर्वप्रथम विलियम जोन्स ने सैंड्रोकोट्स की पहचान चंद्रगुप्त मौर्य के रूप में की ।

2. मगध पर विजय ( 322 ई . पू . ) : पंजाब - सिंध पर कब्जा जमाने के बाद चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य ने मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र की ओर कूच किया । मार्ग में पड़ने वाले क्षेत्रीय राज्यों पर उसने विजय प्राप्त की । चाणक्य ने हिमालय पर्वतीय राज्य के राजा पर्वतक के साथ चंद्रगुप्त मौर्य का गठबंधन कराया । पर्वतक और चंद्रगुप्त मौर्य की संयुक्त सेनाओं ने पाटलिपुत्र को घेर लिया । नंद नरेश धनानंद एवं उसके सेनापति भद्दशाल ने संयुक्त सेना का सामना किया किन्तु हार गये । इस युद्ध में धनानंद के अमात्य ( मंत्री ) शकटार ने चंद्रगुप्त मौर्य की सहायता की । बौद्ध ग्रंथ ' महावंश टीका ' के अनुसार नंद नरेश धनानंद का युद्ध में वध कर दिया गया । जबकि जैन ग्रंथ परिशिष्ट पर्वन ' के अनसार नंद नरेश धनानंद द्वारा आत्म समर्पण किये जाने पर उसे जीवनदान दे दिया गया और उसे अपने परिवार के साथ एक ही रथ में जितना अधिक खजाना ले जा सके उतना खजाना लेकर पाटलिपुत्र छोड़ देने को कहा गया । इस तरह चंद्रगुप्त मौर्य का मगध सामाज्य पर अधिकार हो गया और वह भारत के विस्तृत साम्राज्य का शासक बन गया । इस समय तक चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य का विस्तार सिंधु के मुहाने से गंगा के मुहाने तक था ।

3. सेल्यूकस से संघर्ष एवं संधि ( 305 ई . पू . ) : सिकंदर की मृत्यु के पश्चात् उसके पूर्वी प्रदेशों का उत्तराधिकारी सेल्यूकस निकेटर हुआ । वह अपने सम्राट द्वारा जीते गये भारत के प्रदेशों को पुनः अपने अधिकार में लेने को उत्सुक था । इस उद्देश्य से उसने 305 ई . पू . में भारत पर चढ़ाई की तथा काबुल होते हुए सिंधु नदी पार की । परंतु इस समय का भारत सिकंदरकालीन भारत से पूर्णतया भिन्न था । अतः सेल्यूकस को विभिन्न छोटे छोटे क्षेत्रों के सरदारों के स्थान पर एक संगठित भारत के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का सामना करना पड़ा । एक लंबे संघर्ष के बाद सेल्यूकस चंद्रगुप्त मौर्य से पराजित हुआ और उसे चंद्रगुप्त मौर्य से संधि करनी पड़ी । संधि के फलस्वरूप सेल्यूकस को सिंधु नदी के परे प्रदेश देने पड़े । संधि के परिणाम इस प्रकार थे– ( i ) सेल्यूकस ने चंद्रगुप्त को चार प्रांत एरिया अर्थात् हेरात ( राजधानी हेरात ) , पेरोपनिसडाई अर्थात् काबुल ( राजधानी काबुल ) , अराकोसिया अर्थात् कंधार ( राजधानी -- कंधार ) एवं जेड्रोसिया अर्थात् बलूचिस्तान ( राजधानी मकरान ) दिया । ( ii ) सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलन का विवाह चंद्रगुप्त मौर्य से कर दिया ( एप्पियन एवं स्ट्रैबो के अनसार ) । कुछ विद्वान इसकी प्रामाणिकता पर संदेह करते हैं । ( iii ) चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को उपहार स्वरूप 500 हाथी प्रदान किये ( स्ट्रैवो के अनुसार ) । ( iv ) सेल्यूकस ने मेगास्थनीज को राजदूत के रूप में चंद्रगुप्त के दरबार में भेजा । यह संधि चंद्रगुप्त मौर्य की एक महत्वपूर्ण सफलता थी । इससे उसका साम्राज्य भारतीय सीमा का अतिक्रमण कर पारसीक साम्राज्य की सीमा को स्पर्श करने लगा तथा उसके अंतर्गत अफगानिस्तान का एक बड़ा भाग सम्मिलित हो गया । इसी संधि के परिणामस्वरूप हिन्दुकुश मौर्य साम्राज्य और सेल्यूकस के साम्राज्य के बीच सीमा बना ।

4. पश्चिमी भारत की विजय रूद्रदमन के जूनागढ़ अभिलेख से इस बात की सूचना मिलती है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने पश्चिमी भारत मे सौराष्ट्र तक का प्रदेश जीतकर अपने प्रत्यक्ष शासन के अंतर्गत कर लिया था । इस अभिलेख के अनुसार सौराष्ट्र प्रांत में पुष्यगुप्त वैश्य चंद्रगुप्त मौर्य के गवर्नर के रूप में नियुक्त था और उसने वहाँ सुदर्शन नामक झील का निर्माण करवाया था । महाराष्ट्र के थाना जिले में स्थित सोपारा नामक स्थान से प्राप्त अशोक के शिलालेख से भी चंद्रगुप्त मौर्य के पश्चिमी भारत पर अधिकार की पुष्टि होती है । अशोक अपने अभिलेखों में इस प्रदेश को जीतने का दावा नहीं करता , मतलब साफ है कि सौराष्ट्र के दक्षिण में सोपारा तक का प्रदेश भी चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा ही विजीत किया गया था ।

5. दक्षिण भारत की विजय तमिल लेखक मामूलनार ने लिखा है कि ' मोरियर ' ( अर्थात् मौर्य ) नामक जाति ने दक्षिण भारत पर आक्रमण किया तथा वे विशाल सेना सहित मदुरा तथा तिनेवेल्ली जिले तक पहुँच गये । मैसूर से प्राप्त अभिलेखों से इस बात की पुष्टि होती है कि उत्तरी मैसूर चंद्रगुप्त मौर्य के अधिकार में था । अशोक के अभिलेखों से भी मैसूर पर चंद्रगुप्त मौर्य का शासन परिलक्षित होता है । इस तरह चंद्रगुप्त मौर्य ने विंध्य पर्वत के दक्षिणी भाग के एक बड़े हिस्से पर अपना अधिकार कर मौर्य साम्राज्य का विस्तार किया ।

इस प्रकार चंद्रगुप्त मौर्य का सामाज्य संपूर्ण भारत में फैल गया । मगध साम्राज्य के उत्कर्ष की जो परंपरा हर्यंकवंशीय बिम्बिसार के समय में आरंभ हुई थी , चंद्रगुप्त मौर्य के समय में वह चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई ।

चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य का विस्तार उत्तर पश्चिम में हिन्दुकुश से लेकर दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक तक तथा पूर्व में मगध से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र तक था ।

वी . ए . स्मिथ के अनुसार हिन्दुकुश पर्वत भारत की वैज्ञानिक ( प्राकृतिक ) सीमा थी । चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को हराकर भारत की इस वैज्ञानिक सीमा को प्राप्त कर लिया था । चंद्रगुप्त मौर्य भारत का प्रथम और अंतिम सम्राट था जिसने इस वैज्ञानिक सीमा को प्राप्त किया । इस वैज्ञानिक सीमा को प्राप्त करने में प्रतापी मुगल बादशाह एवं शक्तिशाली अंग्रेज भी असमर्थ रहे ।

चंद्रगुप्त मौर्य का अंत ( 298 ई . पू . ) : चंद्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का समर्थक था । जैन अनुश्रुतियों के अनुसार जीवन के अंतिम चरण में चंद्रगुप्त मौर्य ने राजकाज अपने पुत्र बिन्दुसार को सौंप दिया तथा जैन आचार्य भद्रबाहु से शिष्यत्व ग्रहण कर उसके साथ श्रवणबेलगोला ( मैसूर ) चला गया तथा चंद्रगिरी पहाड़ी पर काया - क्लेश द्वारा 298 ई.पू. में प्राण त्याग किया ।

चंद्रगुप्त मौर्य की उपलब्धियाँ / मूल्यांकनः चंद्रगुप्त मौर्य की उपलब्धियों को देखते हुए वह एक साम्राज्य निर्माता , महान विजेता तथा कुशल प्रशासक ठहरता है ।

साम्राज्य निर्माता : एक सामान्य कुलोत्पन्न होते हुए भी उसने अपनी योग्यता एवं कुशलता के बल पर अपने को सार्वभौम सम्राट बना लिया । वह भारत का प्रथम महान ऐतिहासिक सम्राट था जिसके नेतृत्व में चक्रवर्ती सम्राट के आदर्श को वास्तविक स्वरूप प्रदान किया गया । उसका साम्राज्य अत्यंत विस्तृत था ।

महान विजेता / मुक्तिदाता : चंद्रगुप्त मौर्य को ' मुक्तिदाता ' ( Liberater ) कहा जाता है क्योंकि उसने एक तरफ तो मगध की जनता को नंदों के अत्याचारी शासन से मुक्ति दिलाई तो दूसरी तरफ पंजाब - सिंध से यूनानियों के प्रभुत्व को समाप्त कर विदेशी दासता से मुक्त किया । उसकी सफलताओं ने भारत को विश्व के राजनैतिक मानचित्र में प्रतिष्ठापित कर दिया ।

कुशल प्रशासक : चंद्रगुप्त मौर्य एक अत्यंत कुशल व योग्य प्रशासक था । मौर्यों की प्रशासनिक व्यवस्था , जो कालांतर की सभी भारतीय प्रशासनिक व्यवस्थाओं का आधार कही जा सकती है , बहुत कुछ चंद्रगुप्त मौर्य की रचनात्मक प्रतिभा तथा उसके गुरु एवं प्रधानमंत्री कौटिल्य ( चाणक्य ) की राजनीतिक सूझ - बूझ का ही परिणाम था । चंद्रगुप्त मौर्य एक निपुण व लोकोपकारी शासन व्यवस्था का निर्माता था । उसने पहली बार एक नये प्रकार की शासन व्यवस्था अर्थात् केंद्रीभूत / केंद्रीय शासन व्यवस्था की स्थापना की । उसने अपने व्यक्तित्व व आचरण से कौटिल्य के प्रजाहित ( लोक कल्याण ) के राज्यादर्श को मूर्त रूप प्रदान किया । उसका शासनादर्श बाद के हिन्दू शासकों के लिए अनुकरणीय बना रहा । यहाँ तक कि मुस्लिम व अंग्रेज ( ब्रिटिश ) शासकों ने भी राजस्व व्यवस्था , नौकरशाही तथा पुलिस व्यवस्था के क्षेत्रों में मौर्य शासन के प्रतिमानों का ही अनकरण किया । मौर्य प्रशासन के अधिकांश आदर्शों को आधुनिक युग के स्वतंत्र भारत के शासन में भी देखा जा सकता है ।

अन्य उपलब्धियाँ : चद्रगुप्त मौर्य की अन्य उपलब्धियाँ थीं 1. लोकोपकारिता के कार्य ( विशाल राजमार्गों का निर्माण , सिंचाई सुविधा हेतु सौराष्ट्र में सुदर्शन झील का निर्माण आदि ) 2. धार्मिक उदारता ( चंद्रगुप्त मौर्य का एक यवन कन्या हेलेन से विवाह , चंद्रगुप्त मौर्य का जैन धर्म स्वीकार करना आदि ) 4. वास्तुकला ( पाटलिपुत्र के काष्ठ निर्मित राजप्रासाद का निर्माण आदि ) ।

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